रानीगंज कस्बे के पास स्थित ऐतिहासिक शक्तिपीठ मां बाराही देवी धाम को तमाम प्रयासों के बाद भी मुगलकालीन शासक औरंगजेब खत्म नहीं कर सका। उसकी सारी कोशिशें धरी की धरी रह गईं। 12वीं सदी से पूर्व में स्थापित इस मंदिर के पास स्थित आल्हा-ऊदल का कुआं व सुरंग इसकी ऐतिहासिकता का प्रमाण देते हैं। बावजूद इसके शासन ने इसे कभी पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने का प्रयास नहीं किया। सूबे में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन इसे धाम का विकास नहीं हो सका।
मुगलकाल में औरंगजेब ने इस मंदिर पर आक्रमण कर तोड़फोड़ की। बताते हैं कि भैरव बाबा की मूर्ति पर हमला किया गया उसमें से रक्त की धार बहने लगी। यह दृश्य देखकर औरंगजेब घबरा गया और मां बाराही देवी के मंदिर को बनवाने का पुन: सेनापति को आदेश दिया। मंदिर पर मुगलकालीन कलाकृतियां इस घटना का साक्ष्य दे रही हैं। इतिहास पर गौर करें तो राजा जयचन्द्र के बेटे लाखन व आल्हा-ऊदल में युद्ध हुआ। जिसमें लाखन ने पराजित होकर आल्हा ऊदल से संधि कर ली। लौह गाजर क्षेत्र जो आज चौहर्जन के नाम से जाना जाता है, यह उस समय राजा वैश्य मिदनी सिंह के पास था। राजा मिदनी सिंह ले 30 वर्षों से राज्य का कर नहीं चुकाया था। संधि के अनुसार लाखन ने लौह गाजर क्षेत्र आल्हा-ऊदल को दे दिया।
आल्हा-ऊदल राजा मिदनी सिंह से कर प्राप्त करने लौहगाजर, चौहर्जन आए। दोनोें भाई सई नदी के तट डेरा डालकर रहने लगे और मां बाराही का पूजन दर्शन किया। इसी बीच वैश्य राजा मिदनी सिंह से भयंकर युद्ध हुआ। राजा मिदनी सिंह ने पराजित होने के बाद संधि कर ली। इसके बाद आल्हा-ऊदल ने मां बाराही धाम चौहर्जन में अपने किले का निर्माण करवाया। यहां आल्हा ऊदल का कुआं, चबूतरा, तालाब, पुरानी ईंट आदि अवशेष इसकी पुष्टि करते हैं। यहां कुएं के ऊपर चार पक्के छुहे थे। एक छुहा आज भी जर्जर दशा में विद्यमान है। कुएं को अंदर 25-30 फीट नीचे लोहे के चादर से ढक दिया गया। कुएं के अंदर चारों ओर सुरंग थी, जो अब पट गई है। एक बार जब कुएं की खुदाई प्रारंभ की गई तो तलवार की एक मुठिया प्राप्त हुई जिसका वजन 7 किग्रा था। खुदाई के दौरान एक मजदूर की मौत हो जाने से कार्य बंद कर दिया गया।