ऐसे दौर में जब सियासत धनबल और बाहुबल का पर्याय बन गई हो तब उन जनप्रतिनिधियों की तलाश करना जरूरी हो जाता है जिन्होंने बेहद सीमित संसाधनों और अपार प्रतिबद्धता के बल पर राजनीति में जगह बनाई। इनमें से बहुत से आज गुमनामी के अंधेरे में चले गए। दो बार विधायक रहे ऐसे ही जनप्रतिनिधि संगमलाल शुक्ला का हम परिचय करा रहे हैं। इस श्रृंखला में ऐसे और जनप्रतिनिधियों को सामने लाया जाएगा।
प्रतापगढ़ शहर में पंजाबी कालोनी के सामने 12/14 की कोठरी में अंधरे में रह रहे संगमलाल शुक्ला को देखने के बाद अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वह दो बार विधायक रह चुके हैं। दिन में भी खाट पर लगी मच्छरदानी और दो कुर्सियों के बीच रह रहे संगमलाल विधानसभा चुनाव की तपिश से कोसों दूर समाजवाद के जनक डॉ. राम मनोहर लोहिया पर अपनी किताब लोहिया मार्क्स से आगे को पूरा करने में जुटे हुए हैं। समाजवादी नेता राजनारायण के बेहद करीबी रहे संगलाल को आज की राजनीति का केंद्र बने जातिवाद को लेकर टीस है। 1977 में जनता पार्टी और 1989 में जनता दल के टिकट पर सदर विधानसभा से जीतकर दो बार विधानसभा पहुंचे संगमलाल का पूरा दिन अब लिखने-पढ़ने में ही बीतता है।
प्रतापगढ़ जिले के रानीगंज तहसील के दिघवट गांव के मूल निवासी संगमलाल शुक्ला ने हिंदी में एमए करने के लिए 1958 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था। यहीं से वह समाजवादियों के संपर्क में आए। राजनारायण के साथ रहने के दौरान लोहिया के विचारों से वह बहुत प्रभावित हुए। अंग्रेजी का विरोध करने के कारण एमए प्रथम वर्ष में ही उन्हें विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। 1975 में इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के विरोध में जगह-जगह सभा करने और एक लाख पर्चे बांटने के कारण उन पर राष्ट्रद्रोह लगा दिया गया। 32 लोगों के साथ वह जेल गए। करीब 21 महीने बाद वह जेल से छूटकर प्रतापगढ़ पहुंचे। 1977 में विधानसभा चुनाव हो रहे थे।
अचानक एक दिन राजनारायण का संदेश आया कि जनता पार्टी के टिकट पर प्रतापगढ़ सदर विधानसभा से चुनाव लड़ना है। तब उनके पास शहर में रहने का न ठिकाना था न कोई बंदोबस्त। उधार पर किसी तरह चुनाव कार्यालय खोला और इसके बाद इक्के (तांगा) से तीन लोगों के साथ-साथ गांव-गांव घूमकर प्रचार करना शुरू किया। आज की राजनीति पर कटाक्ष करते हुए संगमलाल बताते हैं कि तब उन्हें यह नहीं पता था कि किस गांव में कितने ब्राह्मण हैं। व्यक्ति संबंधों के बल पर वह पहली बार में ही चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। विधायक बनने के बाद भी उनके रहने का जुगाड़ नहीं हो सका। वह करीब छह महीने तक डाक बंगले में रहे। संगमलाल का व्यक्तिगत जीवन भी गुमनाम हो गया। काफी पहले पत्नी की मौत हो गई। कोई औलाद नहीं है, लेकिन उन्हें जिंदगी से कोई शिकवा भी नहीं। अधिवक्ता भाई के बगल रहने वाले 78 साल के हो चुके संगमलाल बताते हैं कि एक व्यक्ति के रहने के लिए एक कोठरी काफी है। इसी में सारी दुनिया है।
पोलिंग एजेंटों ने लौटा दिए थे रुपये
संगमलाल बताते हैं कि 1977 में पहले विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पोलिंग एजेंटों के लिए पैकेट में 10-10 रुपये भेजे थे। इसकी जानकारी होने के बाद अधिकांश एजेंटों ने रुपये लौटा दिए थे। कहा था कि चुनाव के वक्त इन रुपयों की उन्हें ज्यादा जरूरत पड़ेगी।