राजकीय कॉलेजों में कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को दोपहर का भोजन देने में खेल किया जा रहा है। अरहर की दाल 80 रुपये किलोग्राम होने के कारण बच्चों को मटर की दाल परोसी जा रही है। चालू शिक्षा सत्र में कनवर्जनकास्ट की लागत बढ़ने के बावजूद बच्चों को गुणवत्तायुक्त भोजन नहीं दिया जा रहा है।
जिले के राजकीय इंटर कॉलेजों में कक्षा छह से आठ तक पढ़ने वाले बच्चों के लिए सर्व शिक्षा अभियान के तहत एमडीएम योजना लागू है। यह योजना बीएसए कार्यालय से संचालित होती है जबकि इंटर कॉलेज डीआईओएस के अधीन होते हैं। जीआईसी पर बीएसए का नियंत्रण नहीं होने के कारण प्रिंसिपल एमडीएम योजना के संचालन में मनमानी कर रहे हैं। बाजार में अरहर की दाल 80 रुपये प्रति किलोग्राम होने के कारण बच्चों को मटर की दाल परोसी जा रही है। अभिभावकों की मानें तो कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बच्चे यह समझ ही नहीं पाते हैं कि दाल मिली या सब्जी। मतलब यह है कि महंगी सब्जियां भी खरीदने से स्कूल के प्रिंसिपल परहेज कर रहे हैं।
दोपहर के भोजन में गुणवत्ता की अनदेखी करने से अधिकांश बच्चे मन मारकर खाना खाते हैं तो कुछ बच्चे खाना खाते ही नहीं हैं।
बढ़ती महंगाई को देखते हुए शासन ने चालू शिक्षासत्र में कनवर्जनकास्ट में प्रति बच्चा 38 पैसे की बढ़ोत्तरी कर दी है, इससे वर्तमान में प्रति बच्चा 5.38 रुपये कनवर्जनकास्ट और 150 ग्राम राशन दिया जा रहा है। आश्चर्य की बात है कि इतनी धनराशि मिलने के बाद भी बच्चों को गुणवत्तायुक्त भोजन नहीं दिया जा रहा है। जांच की जिम्मेदारी खंड शिक्षा अधिकारियों को दी गई है, मगर उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के कारण वे कालेज जाने से कतराते हैं। बीएसए एसटी हुसैन ने बताया कि राजकीय स्कूलों से ऐसी शिकायतें मिल रहीं है। जल्द ही टीम गठित कर जांच कराई जाएगी।
स्कूलों में आलम यह है कि खाना नहीं खाने वाले और स्कूल नहीं आने वाले बच्चों की भी गणना प्रतिदिन की जाती है। संख्या बल बढ़ाने का कारण राशन और कनवर्जनकास्ट की रकम हजम करना होता है।
जीआईसी स्कूलों में तैनात रसोइया को उनका हक नहीं मिलता है। एक हजार रुपये मानदेय पर खाना बनाने वाले रसोइयों को वर्ष में ग्यारह माह का मानदेय मिलता है। मगर बोर्ड परीक्षा प्रारंभ होते ही खाना बनना बंद हो जाता है। ऐसी दशा में उनके मानदेय भी काट लिए जाते हैं।