भगवान सूर्य की आराधना का महापर्व छठ व्रत शुक्रवार को नहाय- खाय से शुरू हो गया। घरों में साफ-सफाई के साथ मिट्टी के चूल्हे बनाने की तैयारी की गई। व्रतियों और घर के परिजनों ने शाकाहारी भोजन प्रसाद लिया। चार दिनी इस पर्व में पूूर्वांचल और बिहार प्रांत से जुड़े परिवारों में खुशी का माहौल है।
छठी माता सुख समृद्धि की देवी हैं। धन, धान्य, वैभव के साथ ही पुत्र, पति के लिए भी महिलाएं चार दिन तक व्रत-पूजन करती हैं। इसकी शुुरुआत शुक्रवार से हो गई। व्रती महिलाओं और पुरुषों के साथ घर के सदस्यों ने सफाई की। इसके बाद व्रतियों ने स्नान कर शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण किया। घर के सभी सदस्यों ने व्रतियों के भोजन करने के बाद प्रसाद ग्रहण किया।
मान्यता है कि इस दिन भोजन के के रूप में कद्दू- दाल, लौकी व चावल ग्रहण किया जाता है। दाल चने की होती है। वहीं पूजा में चढ़ाए जाने वाले पकवान बनाने के लिए व्रतियों ने छठी माता के गीत गुनगुनाते हुए मिट्टी के चूल्हे बनाए।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी शनिवार को व्रत रखने वाले दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन ग्रहण करेंगे। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है।
संध्या अर्घ्य 30 अक्तूबर को
व्रत रखने वाले श्रद्धालु 30 अक्तूबर कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को घाट पर जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे। इस दिन घरों में प्रसाद के लिए ठेकुआ, चावल के लड्डू बनाए जाते है। बांस के दौरे में अर्घ्य का सूप सजाकर घाट पर सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
उषा अर्घ्य 31 अक्तूबर को
कार्तिक शुक्ल की सप्तमी यानी 31 अक्तूबर को व्रत रखने वाले घाट पर जाकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके बाद व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर व प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करेंगे।