किसानों की मौत यूं ही नहीं हो रही है। जाहिर है कि उन्हें मदद की उम्मीद नहीं है, इसलिए प्राण छूट रहे हैं। हालत यह है कि गेहूं के दाने जीरे और सौंफ की तरह हो गए हैं। इसके बाद भी तहसील प्रशासन ने फसलों का नुकसान 33 प्रतिशत दिखाया है। जबकि विकास विभाग से बनवाई गई रिपोर्ट में नुकसान का अनुमान 80 प्रतिशत तक पहुंच गया है। तहसील में सदमे से मरने वाले किसानों की संख्या एक दर्जन से अधिक हो गई है। मगर प्रशासन इसे सदमा नहीं मान रहा है। वह पीड़ित परिवारों को फौरी तौर पर सहायता तो उपलब्ध करा रहा है, लेकिन इसे दैवीय आपदा नहीं मानता। यही नहीं उसकी रिपोर्ट पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।
किसानों के मरने का सिलसिला शुरू हुआ तो जिला प्रशासन ने किसानों की फसल के नुकसान की रिपोर्ट बनाने का फरमान जारी कर दिया। इसमें कुछ ही गांवों में थोड़ा बहुत नुकसान दिखाया गया बाकी को निल कर दिया गया। जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी को सर्वे पर शंका हुई तो उन्होंने इसमें विकास विभाग के लोगों को लगा दिया। कालाकांकर के 12 और कुंडा ब्लाक के 11 गांवों की जो रिपोर्ट आई वह चौकाने वाली है। यहां किसानों ने मड़ाई के बाद गेहूं दिखाए जो जीरे और सौंफ की शक्ल में हैं। इससे आटा निकलना तो दूर चोकर भी नहीं बन पाएगा। कुछ किसानों ने तो इस डर से फसलों को काटा ही नहीं है कि मजदूरी देना भी पहाड़ हो जाएगा। ऐसे में फसल खेत में ही फुंकवा दिया जा रहा है।