आजादी की सत्तरवीं वर्षगांठ। यानि सात दशक का लंबा वक्त बीत गया हमें अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, मगर उनके समय से चली आ रहीं कुछ आफतें अब भी हमारे लिए चुनौती बनी हैं। तमाम प्रयासों के बाद भी हम इनसे मुक्ति नहीं पा सके हैं। नि:सन्देह हम आज स्वतंत्रता दिवस का उल्लास मना रहे हैं, लेकिन सोचना यह भी होगा कि इन मुश्किलों से कब मिलेगी आजादी......
1-महिला हिंसा से आजादी
जिले में महिला हिंसा ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। आजादी के बाद भी महिलाएं घरेलू हिंसा से परेशान हैं। उन्हें अपनी स्वतंत्रता से जीने का अधिकार नहीं है। पुलिस में दर्ज महिला हिंसा से जुड़े अपराध पर गौर करें तो बीते सात माह के भीतर 57 मामले आए। इसमे से कई मामलों में पुलिस ने जांच के बाद फाइनल रिपोर्ट भी लगा दी। इसके अलावा दहेज उत्पीड़न के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। 14 अगस्त 2016 तक 96 मुकदमे महिला थाने में दर्ज हो चुके हैं।
2- नशाखोरी से आजादी
नशोखोरी इस जिले की सबसे बड़ी परेशानी है। अवैध शराब का कारोबार जिले में जमकर हो रहा है। गांजा, स्मैक, अफीम का कारोबार भी खुलेआम चल रहा है। रोकथाम करने वालों को भी इस बात की जानकारी है। इसके बावजूद वे नशाखोरी पर पाबंदी तक लगा सके। अब तो हालात बद से बदतर हो चुके हैं। नशेड़ियों को देखने के बाद पुलिस उनसे बचने की कोशिश करती है। दो वर्षो के भीतर करीब आठ करोड़ से अधिक की अवैध शराब पकड़ी जा चुकी है। जिले के हजारों युवा इसकी गिरफ्त में हैं।
3 अपराध से आजादी
अपराध इस जिले की सबसे बड़ी समस्या है। हर दूसरे दिन गोलियां तड़तड़ाती हैं तो चौथे दिन हत्या हो जाती है। जमीन और वर्चस्व की रंजिश ने लोगों को एक-दूसरे के खून का प्यास बना दिया है। बेल्हा में गांधीजी की अहिंसा के मायने समझने और समझाने वाले बहुत कम है। हथिगवां थाना क्षेत्र के बलीपुर में सीओ जियाउल हक की हत्या के बाद पुलिस पर लगातार अपराधी हावी होते रहे। 19 नवंबर 2015 को शहर में ही होटल के बाहर कोतवाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई। राजदत्त मिश्र, प्रभाकर सिंह मीनू, इंद्रमणि शुक्ला समेत पांच अधिवक्ताओं की गोली मारकर हत्या कर दी गई। डबल मर्डर से लोग थर्राते रहे। अधिकारियों के आवासों के करीब गोलियों की गूंज सुनाई पड़ती है। मानिकपुर थाने में घुसकर बदमाशों ने फायरिंग की। थाने के संतरी की हत्या कर दी गई।
4-जाम के झाम से आजादी
शहर को जाम से कब छुटकारा मिलेगा। छोटे से शहर में चौराहे अधिक और ट्रैफिक पुलिस बेहद कम है। इससे आए दिन शहरियों को घंटों जाम में जूझना पड़ता है। यातायात विभाग के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो केवल शहर में छोेटे-बड़े 26 चौराहे हैं। मगर ट्रैफिक पुलिस की संख्या मात्र छह और एक प्रभारी है। शहर में लगने वाले जाम का मुख्य कारण ट्रैफिक पुलिस की कमी है। सुबह स्कूल और ऑफिस के समय लगने वाले जाम में लोग घंटों जूझते रहते हैं, मगर बेचारी पुलिस असहाय बनी रहती है। शहर के चौक, श्रीराम चौराहा, बाबागंज, भंगवाचुंगी चौराहे पर लगने वाला जाम में कभी-कभी लोग घंटों जूझते रहते हैं।
5- खारे पानी से आजादी
सदर विकास खंड के मोहनगंज और शहर के कचहरी और आसपास के मुहल्ले में रहने वाले लोगों को आज भी खारे पानी से छुटकारा नहीं मिला है। भूगर्भ जल विषेशज्ञों ने कई बार इस दिशा में प्रयास किया मगर मुसीबत दूर नहीं हो सकी। भुआलपुर-डोमीपुर के लोग आज भी खारा पानी पीने को बाध्य हैं। जिले के बारह विकास खंडों का जलस्तर खिसकने के कारण पानी दूषित हो गया है। इससे लोगों को स्वच्छ पानी पीने को नहीं मिल रहा है।
6-शिक्षा के बाजारीकरण से आजादी
जिले में शिक्षा का पूरी तरह से बाजारीकरण हो गया है। कान्वेंट स्कूलों में बच्चों को जूता मोजा से लेकर किताब-कापी वितरित करने की जिम्मेदारी ली जाती है। अप्रशिक्षित शिक्षकों से बच्चों को जहां पढ़ाया जा रहा है, वहीं नर्सरी स्कूलों की भरमार हो गई है। जिले में 432 स्कूल ऐसे हैं जो बगैर मान्यता के चल रहे हैं। इसमें सबसे अधिक कक्षा एक से आठ तक के स्कूल हैं। शिक्षा का बाजारीकरण करने में शिक्षा विभाग के अधिकारी भी मददगार बने हुए हैं। वास्तव में जिले के लोगों को बाजारीकरण से मुक्ति दिलाना ही सही आजादी है।
7- अंधेरे से आजादी
देश को आजाद हुए 70 वर्ष होने जा रहे हैं, मगर अफसोस इतने साल बाद भी जिले के करीब साढ़े चार हजार मजरे आज भी अंधेरे में हैं। यहां के ग्रामीणों ने अपने घरों में बिजली जलते हुए नहीं देखा है। ग्रामीण बिजली के आने की बाट जोह रहे हैं मगर वह कब मिलेगी इसका कुछ अता-पता नहीं हैं।
बिजली विभाग के आंकड़ों की मानें तो जिले के करीब साढ़े चार हजार मजरों को बिजली नसीब नहीं हो पाई है। जेवईं, ताला, अतरसंड, रेडी, जेठवारा और रानीगंज इलाके के काफी मजरों में विद्युतीकरण योजना के बाद भी बिजली नहीं पहुंच पाई है। अधिकारियों का कहना है कि राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना में इन मजरों का लक्ष्य रखा गया है।
8-स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली से आजादी
जिले में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह बदहाल हैं। अस्पताल बदहाल, डॉक्टरों और स्टाफ की कमी के अलावा तमाम संसाधनों की कमी के चलते मरीजों का उपचार नहीं हो पा रहा है। जिला और महिला अस्पताल के भवन अंग्रेजों के समय के हैं। आजादी के बाद से दोनों ही अस्पताल का दायरा नहीं बढ़ पाया है। आजादी के बाद से साठ बेड के अस्पतालों का कायाकल्प करने की जरूरत नहीं समझी गई। आज भी तमाम ऐसी जांचें हैं जिनकी सुविधा सरकारी अस्पतालों में नहीं हैं। डेंगू के मरीज का इलाज यहां पर संभव नहीं है। सीटी स्कैन की सुविधा नहीं है। अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर ताला लटका हुआ है। मुख्यालय से लेकर सीएचसी पीएचसी तक स्पेशलिस्ट डॉक्टरों का अभाव है।