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तिरंगे की शान के लिए बेल्हा ने हंसकर दी जान

Mon, 15 Aug 2016 12:04 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
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स्वतंत्रता - फोटो : अमर उजाला
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देश की शान के लिए जान देने में बेल्हा कभी पीछे नहीं रहा। सन 1962 से अब तक हुई जंग में जिले के 32 सपूतों ने तिरंगे की ओर बढ़ रहीं गोलियों को फौलादी सीने पर रोक लिया। देश के लिए शहीद हुए इन जवानों ने बेल्हा का सिर गर्व से ऊंचा किया है। यह बात दीगर है कि उनकी नामौजूदगी में उनके परिवारों को थोड़ी बहुत तकलीफ झेलनी पड़ रही है।
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सरहदी देशों ने जब भी भारत की ओर आंख उठाई तब बेल्हा के जवानों ने भी मुंहतोड़ जवाब दिया। सैनिक कल्याण कार्यालय के रिकार्ड पर गौर करें तो वर्ष 1962 में जब चीन से जंग हुई तो बेल्हा के सीताराम सिंह, हरिविलास सिंह, लियाकत अली, भगवती प्रसाद सिंह, राजबहादुर यादव, राजपत सिंह, अब्दुल हुसैन, हरिनारायण सिंह समेत कुल आठ जवानों ने दुश्मनों को करारा जवाब दिया। तिरंगे की तरफ बढ़ रहीं चीनी गोलियों को इन सपूतों ने अपने फौलादी सीने पर रोकते हुए प्राणों की आहूति दे दी।

भारत और पाक के बीच दो बार जंग हुई। पहली लड़ाई 1965 में हुई। इस जंग में भी देश के लिए बेल्हा के जगदीश तिवारी ने खुद को न्यौछावर कर दिया। ठीक पांच साल बाद वर्ष 1971 में फिर पाकिस्तान ने भारत की ओर नजर उठाई। इस बार भी उसे मुंह की खानी पड़ी। उस वक्त जिले के रामसुख तिवारी, रामअवध मिश्र, रामपाल, अच्छेलाल, एसएन पाठक, अर्जुन सिंह, रामविलास, रामबहादुर सिंह, सूर्यनारायण, वंशीलाल आदि ने दुश्मनों को करारा जवाब दिया। देश की सरहद को पार करने वाली गोलियों के सामने बेल्हा की धरती के यह पुत्र सीना तानकर खड़े हो गए। जब 1989 में आपरेशन पवन श्रीलंका चला तो भारत के लिए बेल्हा के मोहम्मद शरीफ ने बदन का कतरा-कतरा बहा दिया। वर्ष 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ तो भी बेल्हा के लालों ने भारत के लिए अपने पुत्र की कुर्बानी दी। जंग के मैदान में विजय कुमार शुक्ल ने दुश्मनों को नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिया। अचानक विरोधियों की मनहूस गोलियां उनके सीने में पेबस्त हुईं और वह शहीद हो गए।
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इस देश के हम रखवाले
‘आपरेशन रक्षक’ में बार्डर पर पर अचानक हुई गोलीबारी में जिले के रामेन्द्र प्रताप सिंह, शशिकांत, सूबेदार शमसुलहक, मनोज कुमार पांडेय, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, चन्द्रभूषण सिंह ने देश के लिए प्राण हंसते हुए दे दिए। ‘आपरेशन पराक्रम’ में मो. इसरार, अतीकुर्ररहमान, अनिरुद्ध प्रताप सिंह भी तिरंगे के लिए हंसकर शहीद हो गए। ‘आपरेशन रहीनों’ में भी जिले के महादेव यादव की शहादत को बेल्हा का इतिहास कभी बिसरा नहीं सकता।
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