बुधवार भोर में डाला छठ पर उदयाचलगामी सूर्य को अघ्र्य देने के लिए एक बार फिर व्रती महिलाओं और श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। व्रती महिलाएं हाथ में सूप और फल लेकर पानी में उतरने के बाद भगवान भाष्कर का इंतजार करने लगीं। सूर्य की लालिमा दिखने के बाद उन्हें अघ्र्य दिया गया। महिलाएं मंगलगीत गाती रहीं। छठ मइया से सुख-समृद्धि और बेटे के दीर्घायु होने का आशीष मांगा। हवन के साथ ही चार दिनी अनुष्ठान का समापन हो गया।
चार दिवसीय छठ महापर्व की शुरुआत 11 अक्तूबर को कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को नहाय खाय से हुई थी। दूसरे दिन पंचमी को छठव्रतियों ने खरना किया। उसके बाद कृष्ण पक्ष की षष्ठी 13 नवंबर की शाम अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य दिया गया। शाम को विधि विधान से पूजन अर्चन कर व्रती श्रद्धालुओं ने मंगलकामना के लिए घर में कोसी भरकर छठ के गीत गाए। अंतिम दिन कृष्ण पक्ष की सप्तमी यानि बुधवार की भोर में ही भक्तों का रेला बेल्हा देवी सहित जिले के अन्य घाटों पर उमड़ पड़ा। घर से ढोल, नगाड़े की बजाते सिर पर प्रसाद का दउरा व कंधे पर गन्ना लेकर श्रद्धालु घाटों पर पहुंचे। नदी से मिट्टी निकालकर पूजा के लिए बेदी बनाई गई। दीपक से सजावट कर दउरा रखा गया। साथ ही गमछा बांधकर गन्ना नदी घाट के किनारे लगाया गया।
इसके बाद छठव्रती नदी में स्नान कर प्रसाद वाले दउरे, डलिया, सूप को लेकर भगवान भाष्कर के निकलने का इंतजार करने लगे। इस दौरान छठव्रतियों व श्रद्धालुओं ने केलवा के पात पर उगेलन सूरूज देव सहित तमाम गीत गुनगुनाए। भगवान भाष्कर के उदय होते ही श्रद्धालुओं और छठव्रतियों के चेहरे खिल गए। सभी जोर-जोर से छठ माता और सूर्य के जयकारे लगाने लगे। उगते सूर्य को दूध और जल से अघ्र्य देकर मंगलकामना की। विधिविधान से पूजन अर्चन करने के बाद हवन किया गया। उसके बाद भगवान भाष्कर और छठ माता से आशीष मांग छठव्रतियों ने अपने 36 घंटे का उपवास समाप्त किया।