तहसील क्षेत्र के कुछ गांवों में दीपावली पर गणेश-लक्ष्मी की पूजा नहीं होती। यहां लक्ष्मी के रूप में गाय, भैसों के खूूंटे पूजे जाते हैं। इसके बाद गाय भैसों के सींग रंगकर प्रसाद वितरित किया जाता है। यह पूजा घर के बाहर बेल की डाल गाड़ कर होती है।
कुंडा के कुछ गांवों की यादव बस्ती की दीपावली कुछ अलग तरह की होती है। दीप जलाए जाते हैं और बच्चे पटाखे भी छुड़ाते हैं लेकिन इनका पूजा का तरीका अलग है। सबसे पहले तो इस बिरादरी की महिलाएं ही पूजा करती हैं। इसके लिए गांव में किसी एक जगह बेदी बनाई जाती है। यहां बेल की डाल गाड़ दी जाती है। इसके बाद यहीं पर एक गाय या भैंस लाई जाती है। उसकी पूजा लक्ष्मी के रूप में की जाती है। इसके बाद सभी महिलाएं अपने-अपने घर के खूंटे यानी जिसमें गाय, भैंस या गोवंश बांधे जाते हैं उसकी पूजा करती हैं। घर में जितने भी मवेशी होते हैं उनकी सींगे रंगी जाती हैं और उन्हें भी प्रसाद खिलाया जाता है। इसके बाद यह प्रसाद बच्चों में बांटाजाता है।
मान्यता है कि गाय, भैस खासतौर से दुधारू जानवर लक्ष्मी के रूप होते हैं। इनके माध्यम से ही लक्ष्मी घर के अंदर आती हैं। मान्यता यह भी है कि घर की खिड़की और नाबदान भी खुला होना चाहिए। शहाबपुर के अखिलेश यादव, लाखीपुर के मुलायम यादव, अनुराग आदि लोगों का कहना है कि उनके घर में अभी भी बुजुर्ग महिलाएं इसी तरह से पूजा करती हैं।