चार दशक पहले पट्टी इलाके में उतरास-अल्पिका माइनर के लिए 60 बीघे उपजाऊ जमीन देने वाले किसानों अब तक मुआवजे की फूटी कौड़ी नहीं मिली है। मुआवजे व लगान की छूट के नाम पर जमीन देने वाले सरसीडीह, सरायजुमआरी व सरसीखाम गांव के करीब डेढ़ सौ किसानों को वर्षों से आश्वासन की घुट्टी पिलाई जा रही है।
अलबत्ता किसानों से लगान भी वसूला जा रहा है। मुआवजे के लिए की गई विभागीय कार्रवाई ठंडे बस्ते मेें है। किसान जनप्रतिनिधियों एवं अफसरों के कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं, मगर अब तक उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
पट्टी क्षेत्र के किसानों की फसलों की सिचंाई के लिए 1975 में दो माइनर स्वीकृत हुए थे। उतरास-अल्पिका व इटवा माइनर। नहरों की स्वीकृति होने के बाद विभागीय अधिकारियों ने मैप तैयार कर जमीन के लिए किसानों से संपर्क किया। उतरास-अल्पिका माइनर के लिए पट्टी इलाके के सरसीडीह, सरसीखाम व सरायजमुआरी के करीब डेढ़ सौ किसानों की जमीन चाहिए थी।
जमीन उपजाऊ होने के कारण किसान देने के लिए तैयार नहीं थे। हालांकि विभागीय अधिकारियों ने किसानों को मुआवजा व लगान की छूट देने के आश्वासन पर तैयार कर लिया। डेढ़ सौ किसानों की करीब साठ बीघा जमीन माइनर के दायरे में आई। माइनर की खुदाई के दौरान विभागीय अधिकारियों ने किसानों की सूची तैयार कर शासन को भेजा।
लंबे समय तक इंतजार के बाद भी किसानों को मुआवजा नहीं मिला। अलबत्ता लगान भी वसूली जाने लगी। इससे नाराज किसानों ने आवाज उठानी शुरू कर दी। प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को पत्र लिखे। इतना ही नहीं विभागीय अधिकारियों से मिले। वर्ष 2016- 17 में अधिशाषी अभियंता सिंचाई से किसानों ने मुलाकात की।
उन्होंने समस्या के निराकरण के लिए आश्वास्त करते हुए अधिशाषी अभियंता सिंचाई खंड प्रतापगढ़ शारदा सहायक 51 को जल्द ही मामले को निस्तारित करने के निर्देश दिए। मगर इसके बाद भी कुछ नहीं नहीं हो सका।
हर चुनाव में मुद्दा, बाद में निराशा
किसानों के मुआवजे का मुद्दा हर चुनाव में उठा। वह चाहे लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा। मगर मुद्दे का हलाभला अब तक नहीं हो सका। जनप्रतिनिधियों की ओर से किसानों को मुआवजा तो नहीं मिला, महज निराशा हाथ लगी।