कृषि विभाग में अनुदान के एवज में अफसरों की जेब नहीं भरने वाले किसानों की झोली खाली रह गई। आरोप है कि अनुदान के लिए आवेदन करने वाले पात्र किसानों से धनराशि का पचास प्रतिशत कमीशन मांगा गया। जो किसान देने में समर्थ थे वह तो लाभ उठाने में सफल रहे, मगर जिन्होंने असमर्थता व्यक्त की उन्हें योजना से बाहर करते हुए धनराशि शासन को वापस कर दी गई। कृषि विभाग से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना के तहत किसानों को कृषि यंत्रों की खरीद पर मिलने वाले अनुदान को सीधे खाते में भेजने के लिए डीबीटी योजना प्रारंभ की गई थी। मगर, भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे अफसरों की मिलीभगत के चलते यह योजना पूरी तरह फेल हो गई है। दरअसल अनुदान का सीधा लाभ किसानों को देने के लिए ऑनलाइन भुगतान की योजना प्रारंभ की गई थी।
पूरे देश में उत्तर प्रदेश एकमात्र ऐसा प्रांत हैं, जहां अनुदान की रकम सीधे किसानों के खाते में भेजी गई। विभाग में पारदर्शिता बरतने के लिए प्रारंभ की गई इस योजना को कृषि विभाग के अफसरों ने तार-तार करते हुए उन्हीं किसानों को योजना का लाभ दिया जिन्होंने उनकी जेब भरने में कोई कमी नहीं छोड़ी। पहले अपनी जेब भरने और बाद में अनुदान की राशि देने का फंडा खुलेआम चलाया गया। किसानों की मानें तो अनुदान की पचास प्रतिशत रकम मातहत मांग रहे थे। बता दें कि रोटावेटर में 35,000, थ्रेसर में 40,000, सीडड्रिल ख्रीद पर 15,000 और लेजरलैंड लेबलर खरीद पर 1.5 लाख रुपये का अनुदान दिया जाता है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रभावी कदम के रूप में डीबीटी (डारेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर) योजना प्रारंभ की गई, मगर इसमें भी सेंध लगाकर सुविधा शुल्क की जमकर वसूली हुई।