होनी को कौन टाल सकता है। नियति पर किसी का वश नहीं। शुक्रवार सुबह शहर के होटल गोयल रेजीडेंसी में हुए हादसे ने इस बात को फिर साबित कर दिया। हादसे का शिकार हुए ज्यादातर लोग काम के सिलसिले में ही शहर आए थे।
सुबह मिलने का वादा कर साथ छोड़ गए मनोज
अमर उजाला के डिप्टी मैनेजर मनोज शर्मा काम के सिलसिले में ही गुरुवार को इलाहाबाद से प्रतापगढ़ पहुंचे। वह साथियों के साथ गुरुवार को दिन भर फील्ड में काम करते रहे। रात करीब दस बजे तक प्रतापगढ़ ब्यूरो कार्यालय में रहे। इसके बाद साथियों से सुबह मिलने का वादा कर होटल गोयल रेजीडेंसी चले गए। उन्हें क्या पता था कि काल उन्हें अपनी तरफ खींच रहा है और गुरुवार की रात उनके जीवन की आखिरी रात होगी। शुक्रवार को शाम तक उन्होंने घर पहुंचने की बात कही थी, लेकिन इससे पहले ही मौत ने उन पर झपट्टा मार दिया।
बमुश्किल एक माह पत्नी के साथ रह सका दिलीप
होटल में कंप्यूटर आपरेटर की नौकरी करने वाला दिलीप कुमार पुत्र वीरेन्द्र प्रसाद निवासी कादिलापुर बमरौली इलाहाबाद की शादी 19 मई को पूजा के साथ हुई थी। 14 जून को पूजा की विदाई हो गई। 15 जून को दिलीप फिर से नौकरी पर आकर डट गया। लेकिन आग ने उसे हमेशा के लिए पूजा से दूर कर दिया। अभागी पूजा को क्या पता था कि एक बार छोड़कर आने के बाद दोबारा उसे पति के साथ रहने का मौका नहीं मिलेगा। बेटे को खोने का गम उसके पिता पिता वीरेन्द्र व भाई प्रदीप को खाए जा रहा था।
छोटे भाई की शादी नहीं कर सका बृजेश
पट्टी कोतवाली के नारंगपुर निवासी विद्युत विभाग के कैशियर बृजेश ने परिवार के साथ रहने के लिए नयामाल गोदाम रोड पर किराए पर कमरा ले रखा था। गुरुवार को साथियों संग वह बाराबंकी गया था। देर रात लौटा तो घर न जाकर होटल पहुंच गया। खाना खाने के बाद वह होटल में ही रुक गया। मौत उसे भी यहां तक खींच कर ले आई। सुबह उसकी मौत की खबर सुनकर पत्नी मंजू अपनी आठ माह की बेटी माही को लेकर पोस्टमार्टम हाउस पहुंची। उसका विलाप देखकर सबकी आंखें भर आईं। मां सीता देवी अपने जिगर के टुकड़े को गले से लगाकर बिलखने लगी। बृजेश तीन भाइयों में दूसरे नंबर का था। उसने छोटे भाई रामप्रवेश की शादी भी तय कर रखी थी। इसी माह में सगाई होनी थी, लेकिन नियति को यह मंजूर नहीं था।
बेटी से हमेशा के लिए दूर चले गए सत्याव्रता
लखनऊ की नीलमथा आदर्श नगर कालोनी में रहने वाले सत्याव्रता बेवर्ता पुत्र साची इंदिरा गांधी अस्पताल अमेठी में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर तैनात थे। इन दिनों प्रतापगढ़ में अस्पताल की ओर से नेत्र शिविर लगाया जा रहा है। इसी सिलसिले में वह आकर होटल में ठहरे हुए थे। उन्हें क्या पता था कि वे पत्नी गीतांजली व चार वर्षीय बेटी सौम्या से हमेशा-हमेशा के लिए दूर चले जाएंगे।
कैंप में आया बसंत नहीं लौट सका घर
पुणे के कवैरोड निवासी बसंत नारायण शिंदे पुत्र नारायण गणेश भी इंदिरा गांधी अस्पताल दिल्ली में तैनात था। जिले में आयोजित होने वाले कैंप में शामिल होने के लिए साथियों के साथ प्रतापगढ़ 15 जून को ही आ गया था। आखिरकार मौत ने उस पर अपना पंजा मार दिया।
बाराबंकी नहीं लौट सका खालिद
बाराबंकी के रसूलपुर गुलरहा निवासी खालिद किरमानी पुत्र मोअली बजाज आलियांज में जनरल मैनेजर के पद पर तैनात था। गुरुवार को विभागीय काम से प्रतापगढ़ आया था। रात हो जाने के कारण गोयल होटल में ठहर गया। आग लगने के बाद धुएं के कारण उसका दम घुट गया।
काश पत्नी की बात मान गया होता धर्मेंद्र
गाजीपुर जनपद के डेढ़गावां निवासी धर्मेंद्र राय पुत्र राजेन्द्र बनारस में रहकर एनजीओ चलाता था। उसका संस्थान इंदिरा गांधी अस्पताल से अटैच है। गुरुवार को वह प्रतापगढ़ कैंप में काम करने वाले डॉक्टरों से मिलने आया था। धर्मेंद्र की पत्नी उसे आने से रोक रही थी। मगर उसने उसकी बातों को अनसुना कर दिया। शहर में ही रात हो जाने पर वह होटल में रुक गया। खाना खाने के बाद सोया तो फिर उठ नहीं सका। उसका एक बेटा आशू व बेटी रूपल है।
विशाल के लिए आखिरी शहर बन गया प्रतापगढ़
गोरखपुर के बेलसडास बड़हलगंज निवासी विशाल चौहान पुत्र सुनील किसी काम से शहर आया था। वह होटल में रुक गया। दम घुटने से उसकी भी मौत हो गई। जिला प्रशासन ने उसके घर पर घटना की जानकारी दे दी है, मगर खबर लिखे जाने तक परिजन अस्पताल नहीं पहुंच सके थे। इसलिए शव को पोस्टमार्टम नहीं हुआ।
सबको रुला गई प्रियंका
झारखंड के रांची की रहने वाली प्रियंका (32) पुत्री रामचरन श्रीवास्तव किसी काम से प्रतापगढ़ आई थी। रात हो जाने के कारण वह भी गोयल होटल में रुक गई। मगर उसके साथ कौन था, यह नहीं पता चल सका। न तो कोई मोबाइल नंबर मिला। उसके पास से मात्र एक कागजात मिला, जिसमें उसका नाम व पता लिखा था। उसके परिवार से कोई नहीं पहुंचा था।