कान्वेंट स्कूलों से बराबरी करने के लिए प्राइमरी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करने की योजना पूरी तरह फेल हो गई है। इन स्कूलों के बच्चों को अंग्रेजी नहीं, बल्कि हिंदी मीडियम में ही शिक्षा दी जा रही है। दरअसल, अध्यापक जहां अंग्रेजी से बचना चाह रहे हैं, वहीं बच्चे भी पढ़ने से किनारा काट रहे हैं। स्कूलों के रंगरोगन के साथ ही बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर की भी व्यवस्था की गई, मगर बच्चे हिंदी मीडियम में पढ़ाई कर रहे हैं।
बेसिक शिक्षा विभाग के 132 प्राइमरी स्कूलों को चिह्नित करके कान्वेंट स्कूलों की तरह अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई प्रारंभ की गई है। जिले के 17 विकास खंडों में मॉडल स्कूलों के रूप में चिह्नित इन स्कूलों की तर्ज पर जिले के अन्य स्कूलों को भी विकसित करने की योजना थी। मगर इन स्कूलों में चमक-दमक के सिवा कुछ भी नहीं रह गया है। दरअसल, इन स्कूलों को अंग्रेजी माध्यम पढ़ाई के लिए अपडेट किया गया, मगर दुर्भाग्य यह है कि अध्यापक बच्चों को न तो अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देना चाहते हैं और न ही बच्चे पढ़ना चाहते हैं।
अध्यापकों की मानें तो बच्चे हिंदी स्पष्ट नहीं पढ़ पाते हैं, अंग्रेजी की बात तो दूर रही। फिलहाल अंग्रेजी माध्यम 35 स्कूलों में अध्यापकों के 92 पद अभी खाली हैं। इससे बच्चों को नियमित पढ़ाई नहीं हो पा रही है। नजीर के तौर पर खुले इन स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम पढ़ाई नहीं हो पा रही है। आलम यह है कि बच्चों को अंग्रेजी और हिंदी दोनों माध्यम की पुस्तकें प्रदान की गई है। बच्चे हिंदी माध्यम की ही पुस्तकें लेकर आते हैं।
अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में तैनाती पानेे वाले अधिकांश अध्यापक ऐसे हैं, जिनकी हाल में ही तैनाती की गई थी। दूरदराज के स्कूलों में नियुक्त शिक्षकों के तबादले पर रोक लगी हुई थी। इसलिए घर के नजदीक तैनाती पाने के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में अपनी तैनाती करा ली।
जिले के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में तैनात अध्यापक अंग्रेजी माध्यम शिक्षा दे रहे हैं। औचक निरीक्षण में अगर हिंदी मीडियम में शिक्षा देते हुए कोई अध्यापक मिलेगा, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।
अशोक कुमार सिंह, बीएसए।