मन में बदलाव का उन्माद था। सियासत में अटल बिहारी वाजपेयी का आकर्षण था। जीवन पर उनके भाषणों का प्रभाव था। जेब में धेला भी नहीं था, लेकिन उनके एक इशारे पर इलाहाबाद जनपद की बारा विधानसभा से दिग्गज कांग्रेसी नेता हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ ताल ठोंक दी। 1974 में जनसंघ के टिकट पर चुनाव मैदान में कूदे बृजेश शर्मा ने अपने चंद कार्यकर्ताओं के साथ दिनभर लाई-चना चबाकर ही बहुगुणा को परेशान करके रख दिया। हालांकि वह चुनाव हार गए, लेकिन साइकिल और टेंपो से चुनाव में प्रचार कर कड़ी टक्कर दी।
इमरजेंसी के दौरान वह 16 महीने जेल में भी बंद रहे। बाद में प्रतापगढ़ संसदीय सीट से एक और दिग्गज कांग्रेसी नेता राजा दिनेश सिंह के खिलाफ भी लोकसभा का चुनाव लड़ा। 1991 में वह भाजपा के टिकट पर प्रतापगढ़ सदर से विधायक बने और उन्हें परिवहन राज्यमंत्री बनाया गया। मंत्री बनने के बाद भी उनके पास अपना कोई वाहन नहीं था। चुनाव के दौरान प्रचार के लिए किराए पर जीप ली गई थी और कार्यकर्ता चंदा मांगकर उसका किराया भरते थे।
मूलरूप से प्रतापगढ़ जिले के कोहड़ा गांव के रहने वाले बृजेश शर्मा बचपन से ही संघ से जुड़े थे। इलाहाबाद में रहने के दौरान वह संघ की शाखाओं में शामिल होते थे। राजनीति उन्होंने छात्र जीवन से ही शुरू कर दी थी। 1974 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष बने थे। अपने भाषणों से लोगों को प्रभावित करने वाले बृजेश इसी दौरान अटलजी के संपर्क में आए। उनकी प्रतिभा को देखते हुए अटलजी ने उन्हें 1974 के विधानसभा चुनाव में हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ उतार दिया। 1991 में वह भाजपा के टिकट पर प्रतापगढ़ सदर से जीतकर पहली बार विधायक बने। बृजेश को आज की राजनीति से बड़ी तकलीफ हैं। कहते हैं आज के नेताओं का न राजनीतिक जीवन है न सामाजिक। हवा का रुख भांपकर टिकट मांगते हैं। तब गुंडई और पैसे का कोई मतलब नहीं था।