जमाना स्मार्टफोन का है, हाथों में बड़े-बड़े स्मार्टफोन पर थिरकती
उंगलियां और मोबाइल की स्क्रीन पर नजर गड़ाए लोग कहीं भी नजर आ जाएंगे। घर,
दफ्तर और रास्ते में यह नजारा अब आम है। अब यही नजारा स्कूलों में भी
देखने को मिल रहा है। जहां मास्साब मोबाइल से चिपके नजर आते हैं। वे
क्लासरुम में बैठने के बावजूद पठन-पाठन पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते
बल्कि सोशल साइट पर ही अधिक व्यस्त रहते हैं।
परिषदीय स्कूलों में सरकार
की अनेक योजनाएं संचालित हो रही हैं। सरकार का ध्यान इन स्कूलों में
शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार की अपेक्षा इन लुभावनी योजनाओं के सफल
क्रियान्वयन पर अधिक होता है। इसी का उदाहरण है कि परिषदीय शिक्षकों के लिए
मोबाइल लगभग अनिवार्य है। स्कूल खुलने के चंद घंटों बाद ही मिड डे मील
प्राधिकरण लखनऊ से फोन की घंटी घनघनाने लगती है। मास्साब को भोजन ग्रहण
करने वाले बच्चों की संख्या मोबाइल से ही देनी होती है। बच्चों का नामांकन
भी माह में एक बार मोबाइल से ही बताना होता है। यही नहीं आए दिन ब्लाक स्तर
से अनेक सूचनाएं भी मोबाइल के माध्यम से ही प्रधानाध्यापकों को बतानी
पड़ती है।
सूचनाओं के आदान-प्रदान में मोबाइल एक महत्वपूर्ण माध्यम है
लेकिन बच्चों की पढ़ाई में यह बहुत बाधक भी बन रहा है। स्कूलों में मोबाइल
के दुष्प्रभावों के कारण ही अनेक बड़े निजी शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों
के स्कूल समय में मोबाइल के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। किंतु परिषदीय
स्कूलों में ऐसा नहीं है। शिक्षकों की नई पीढ़ी स्मार्टफोन से लैस है। और
टीचर व्हाट्सएप, फेसबुक और गूगल पर ज्यादा समय व्यतीत करते हैं। बच्चों को
कोई कार्य देकर मास्साब आनलाइन चैटिंग भी करते हैं। कुछ प्रदेश में भी इसी
प्रकार की शिकायतें मिली तो वहां राज्य सरकारों ने कड़े नियम लागू कर दिए
लेकिन सूबे की सरकार को शायद शिक्षकों के स्कूल समय में मोबाइल के इस्तेमाल
से कोई गुरेज नहीं है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई पर विपरीत असर पड़ रहा है।