अधिवक्ताओं और पुलिस के बीच बवाल की आशंका से भयभीत दुकानदारों ने अपनी दुकानों के ताले नहीं खोले। इतना ही नहीं कचहरी के इर्द गिर्द सजने वाली दुकानें भी बंद रहीं। पटरी दुकानदार से लेकर दूसरे लोग कचहरी के हालात पर बराबर नजर गड़ाए रहे। जबकि वादकारी कम ही दिखाई पड़े।
इलाहाबाद के प्रकरण को लेकर वकीलों के उग्र आंदोलन की आशंका बुधवार से ही लोगों को हो गई थी। ऐसे में हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस के टकराव की संभावना भी जताई जा रही थी। हर दिन कचहरी से लेकर इर्द गिर्द गुलजार रहने वाली सड़क और पटरी पर लगने वाली दुकानें नहीं दिखाई पड़ी। यहां तक कि कचहरी के इर्द गिर्द की दुकानें भी बंद रही। अधिवक्ताओं के जाम के दौरान तो दुकान खोल चुके लोग अपनी दुकानें बंद कर दूर खड़े हो गए। कचहरी में होने वाली नारेबाजी के बाद खुली दुकान के स्वामियों की धड़कन बढ़ जाती थी। भारी पुलिस बल और अधिवक्ताओं की नारेबाजी देख पटरी दुकानदार खासे भयभीत थे।
वे कचहरी के हालात पर पूरी तरह से नजर रखे हुए थे। माहौल शांत होने के बाद ही लोगों ने अपनी दुकानें खोलीं लेकिन सामानों को बाहर सजाने से कन्नी काटे रहे। हर दिन की अपेक्षा गुरुवार को कचहरी में वादकारियों की संख्या भी कम ही देखने को मिली। बवाल की आशंका से बहुत कम वादकारी ही कचहरी आए थे। यहां तक कि आबकारी विभाग, मनोरंजन समेत दूसरे विभाग के अधिकारी और कर्मचारी तो सुबह से ही कार्यालय से दूरी बनाए रहे। आंदोलन शांत होने के बाद कर्मचारियों की अधिकारी खोजबीन करते रहे।