स्थानीय तहसील में दो सौ रुपये खर्च करने पर घंटे भर में हाथोंहाथ मतदाता पहचान पत्र मिल जाता है। एसडीएम की नाक के नीचे यह गोरखधंधा धड़ल्ले से चल रहा है। इसके चलते इलाके के भोलेभाले ग्रामीण गाढ़ी कमाई लुटाने को मजबूर हैं। पूर्व जिलाधिकारी से शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो सकी।
लालगंज तहसील में एक नामी कंपनी के पास मतदाता पहचान पत्र बनाए जाने का टेंडर है। कंपनी ने यहां एक संविदाकर्मी तैनात कर रखा है। यहां इलाके के लोगों का निर्वाचन कार्ड संबंधी कार्य नि:शुल्क होना चाहिए। इसके बदले कंपनी को निर्धारित धनराशि उपलब्ध कराने का सरकारी प्रावधान है। लेकिन यहां धनउगाही कर मतदाता पहचान पत्र बनाए जाने का गोरखधंधा फलफूल रहा है। इसके लिए यहां तैनात संविदा कर्मचारी दो सौ रुपये वसूल करता है और चंद घंटे बाद नया कार्ड बनाकर दे दिया जाता है। कार्ड नया हो या पुराना यहां सब काम हो जाता है।
जिन ग्रामीणों का पुराना निर्वाचन कार्ड गायब है, उनसे धन उगाही कर नेट के माध्यम से प्रिंट आउट निकाला जाता है। और उसके ऊपर चमचमाता होलोग्राम लगाकर लैमिनेशन करवाने के बाद दे दिया जाता है। इसी तरह पहले से तैयार फार्मेट में नाम पता और जन्मतिथि भरकर फर्जी तरीके से नए वोटर कार्ड भी बनाए जा रहे हैं। यह गोरखधंधा तहसील में एसडीएम न्यायालय के ऊपरी तल पर फलफूल रहा है। इलाके के मोहनलाल, विकास कुमार, अरविंद सिंह, हीरालाल यादव, सुरेश गौड़, संदीप सिंह आदि ने बताया कि मतदाता पहचान पत्र बनाने के एवज में उनसे दो सौ रुपये की मांग की गई।
लालगंज। तहसील में तैनात संविदाकर्मी से मिलीभगत कर सहज जन सेवा केंद्र संचालक भी मलाई काट रहे हैं। संचालक यहां आने वाले ग्राहकों से दो सौ से पांच सौ तक पैसा वसूलते हैं। नेट से प्रिंट आउट लेकर अथवा कंप्यूटर टाइप कर मतदाता पहचान पत्र बनाया जाता है। लोगाें की मानें तो इसके बाद तहसील के संविदाकर्मी से सौ रुपये देकर मोनोग्राम लेकर पहचान पत्र पर चिपकाकर उन्हें दे दिया जाता है। सहज जन सेवा केंद्रों पर इन दिनों वोटर कार्ड बनवाने के लिए लोगाें की भीड़ लगी रहती है।
प्रदेश के निर्वाचन कार्यालय से तहसील में मतदाताओं की सुविधा के लिए टेंडर देकर छोटा से कार्यालय खोला गया है। नियमानुसार यहां मतदाता पहचान पत्र के लिए सिर्फ फार्म भरवाया जाता है। इसे आनलाइन लखनऊ स्थित निर्वाचन कार्यालय भेजा जाता है। इसके बाद लगभग पंद्रह दिनों बाद वोटर कार्ड बनकर आता है, जिसे लेखपाल के माध्यम से संबंधित लाभार्थी तक पहुंचाया जाता है। लेकिन यहां नियम कानून ताक पर रख दिया गया है।