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गरीबी से तंग वृद्ध दंपती ने जहर खाकर दी जान

Thu, 09 Jul 2015 11:46 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
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गरीबी व बीमारी से तंग वृद्ध दंपती ने चूहा मारने की दवा खाकर जान दे दी। गुरुवार की सुबह कोई हलचल न देख आसपास के लोगों को जानकारी हुई। सूचना मिलने पर पहुंची पुलिस के सामने उसके भतीजे ने दोनों की हत्या की आशंका जताई। अंतू थाना क्षेत्र के रायचंद्रपुर महाबाभन का पुरवा निवासी राम कृपाल (75) नि:संतान था। वह तीन वर्ष से बीमारी के चलते चारपाई पर ही पड़ा था। उसकी पत्नी कस्तूरी देवी (71) देखभाल करती थी। गुरुवार की सुबह रामकृपाल के रिहायशी छप्पर से हलचल न होता देख आसपास के लोगों को शंका हुई।
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वे छप्पर के भीतर पहुंचे तो देखा वृद्ध दंपती की धड़कन बंद है। लोगों ने पुलिस को सूचना दी। शव के करीब ही चूरा मारने की दवा का खाली पैकेट पड़ा था। वृद्ध का भतीजा उमाशंकर आरोप लगाने लगा कि जमीन खरीदने वाले ने ही दोनों को इसलिए जहर देकर मार डाला ताकि अधिक दिनों तक उनकी सेवा न करनी पड़े। मृतक रामकृपाल ने जमीन का बैनामा करने के दौरान यही शर्त रखी थी कि जिंदगी भर उनकी देखभाल वही करेगा। एसओ रामनरेश यादव ने बताया कि प्रथम दृष्टया यही लगता है कि वृद्ध दंपती बीमारी से तंग आकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। भतीजे के आरोपों की जांच की जा रही है।

अंतू के रायचंद्रपुर महाबाभन का पुरवा निवासी राम कृपाल व उसकी पत्नी कस्तूरी देवी के मौत की खबर पर लोगों का मजमा लग गया। मौके पर पहुंची पुलिस की मौजूदगी में दस जगह की तलाशी ली गई लेकिन अन्न एक दाना भी वहां नहीं मिला। इस दौरान जमीन खरीदने वाले शंभूनाथ की पत्नी ने बताया कि वह हमेशा गेहूं, चावल और दाल देती थी। बराबर हालचाल लेती रहती थीं। दवा का पैसा भी हमेशा दिया करती थीं।
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रामकृपाल व कस्तूरी ने भी विवाह के बाद बच्चों की किलकारी घर में गूंजने का सपना संजो रखा था। शादी के कई वर्ष बाद भी दोनों को बच्चे पैदा नहीं हुए। इससे वे परेशान रहने लगे। गांव के लोगों ने कई बार रामकृपाल को समझाने की कोशिश की लेकिन वह दूसरी शादी के लिए राजी नहीं हुआ। संतान न होने का दर्द दोनों को जिंदगी भर सालता रहा। लोगों का कहना था कि यदि बेटी भी होती तो आज यह नौबत न आती।

नि:संतान रामकृपाल के पास अधिक खेत भी नहीं था। शरीर में जब तक ताकत थी वह मेहनत मजदूरी कर घर का खर्च चलाया करता था। उम्र के साथ मजदूरी भी उसे बंद करना पड़ा। उसकी आर्थिक हालत बहुत ही खराब थी। इसके बावजूद गांव से लेकर ब्लाक के जिम्मेदारों को उसकी दशा दिखाई नहीं पड़ी। उसे बीपीएल या अंत्योदय का कार्ड नहीं मिला बल्कि एपीएल कार्ड मिला। रुपये न होने के कारण वह राशन भी नहीं ले पाता था।
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