‘डीएम का निर्देश बना लाखों की कमाई का जरिया!’ शीर्ष से 26 दिसंबर को अमर उजाला में छपी खबर को जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी ने संज्ञान में लिया है। पैसे लेकर राज्यवित्त आयोग मद के खर्च के बनाए जा रहे उपभोग प्रमाण पत्र का स्थलीय सत्यापन होगा। जिला प्रशासन के जरिए कराए जाने वाले सत्यापन में खामी मिलने पर ग्राम पंचायतों में तैनात सेक्रेटरी पर कार्रवाई होगी। कहा गया है कि उपभोग प्रमाण पत्र देने का काम सेक्रेटरी का ही है। उपभोग प्रमाण पत्र में दिए गए एक-एक कार्य का सत्यापन होगा।
बता दें कि पूर्व में राज्यवित्त आयोग का पैसा ग्राम पंचायतों में भेजा गया था। ग्राम पंचायतों ने उस धन से गांवों में मरम्मतीकरण का काम कराया। नियम यह है कि इस मद से खर्च हुए धन का उपभोग प्रमाण पत्र भी ग्राम पंचायतें देंगी। मगर हो यह रहा है कि किसी भी ग्राम पंचायत ने जिला प्रशासन को उपभोग प्रमाण पत्र नहीं दिया। प्रमाण पत्र न मिलने से यह पता नहीं चल पा रहा कि दिए गए पैसे से ग्राम पंचायतों में किन-किन कार्यों को कराया गया। इस बार फिर उसी मद का पैसा ग्राम पंचायतों में जाना था। शासन ने समय से बजट भी दे दिया। पूर्व की स्थिति से नाराज डीएम ने शर्त रखते हुए प्राप्त पैसे को ग्राम पंचायतों में भेजने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा था कि ग्राम पंचायतों के खाते में वह पैसा जाएगा जरूर मगर बगैर उपभोग प्रमाण पत्र दिए कोई नहीं निकाल सकेगा।
उनका यह निर्देश कुछ अफसरों व कर्मचारियों के लिए कमाई का जरिया बन गया। उन्होंने उपभोग प्रमाण, कार्य सूची देने व कार्यों की आनलाइन फीडिंग सहित तमाम काम कराने को सेक्रेटरी और प्रधान को घर या दफ्तर में बुलाना शुरू कर दिया। फार्म 42 यानी उपभोग प्रमाण पत्र और फार्म 19 अर्थात कार्यवार सूची एवं प्रियाशाफ्ट फीडिंग आदि का दो से ढाई हजार रुपये लेकर कोरम पूरा कराया जाने लगा। इस प्रकरण की खबर अमर उजाला में छपी तो जिलाधिकारी ने उसे संज्ञान में ले लिया। डीएम अमृत त्रिपाठी ने कहा है कि वह प्राप्त उपभोग प्रमाण पत्र में दर्ज कार्य सूची का स्थलीय सत्यापन कराएंगे। इसमें खामी मिलने पर सीधे संबंधित ग्राम पंचायत में तैनात सेक्रेटरी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ एफआईआर भी दर्ज कराएंगे। डीएम के इसकी खबर मिलते ही ग्राम पंचायतों से लेकर डीपीआरओ कार्यालय तक में हड़कंप की स्थिति है।