कुंडा में भी एक साल पहले शासन ने ट्रामा सेंटर स्वीकृत किया था, लेकिन शिलान्यास के बाद भी इसका निर्माण नहीं हो सका। एक ईंट भी नहीं रखी जा सकी। जमीन पर लगा शिलापट्ट लोगों को मुंह चिढ़ा रहा है। बजट न मिलने के कारण काम ही नहीं शुरू हो सका। इससे लोगों की उम्मीदों को करारा झटका लगा है।
लखनऊ-इलाहाबाद हाईवे पर बसे कुंडा के लोगों की अधिक संख्या में दुर्घटनाओं में मौत हो जाती है। आए दिन तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आकर लोग घायल हो जाते हैं। ज्यादातर लोगों को इलाहाबाद ही भेजा जाता है। एक साल पूर्व इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कुंडा कस्बे से छह किमी दूर स्थित शेखपुर आशिक में ट्रामा सेंटर के निर्माण के लिए नींव रखी गई थी। इससे क्षेत्रीय लोगों में उम्मीद जगी थी कि अब रोड पर होने वाली दुर्घटनाओं में घायल होने वाले लोगों की जान बच सकेगी। हालांकि कुछ दिन बाद आई जांच में इस ट्रामा सेंटर के कस्बे और सीएचसी से दूर होने के चलते डीजी ने अवरोध पैदा कर दिया था। कारण था कि ट्रामा सेंटर के लिए अगल से स्टाफ नहीं दिया जा सकता। यह जहां भी बनेगा अस्पताल के अंदर ही बनेगा। कुंडा सीएचसी से छह किमी की दूरी होने के कारण वहां का स्टाफ ट्रामा सेंटर में काम नहीं कर सकता था। हालांकि बाद में इसका हल भी निकाल लिया गया। भदरी गांव के लिए आई पीएचसी को शेखपुर में ही बनवाने और उसी के साथ ट्रामा सेंटर बनाने का प्रपोजल भेजा गया। पीएचसी का स्टाफ दोनों अस्पताल देख सकता था। यह प्रपोजल गया तो इस पर मुहर लग गई, लेकिन फिर बजट का आवंटन नहीं हो सका। न तो अधिकारियों ने फोकस किया और न ही सरकार में बैठे लोगों ने। बजट के अभाव में ट्रामा सेंटर तैयार नहीं हो सका। उधर ट्रामा सेंटर के चक्कर में भदरी सीएचसी भी नहीं बन पाई है।