लाइब्रेरी का समय के हिसाब से बदल रहा रूप
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जिले के अधिकांश महाविद्यालयों में पुस्तकालयों की स्थापना ही नहीं हो सकी है। ऐसे में यूजीसी और शासन के गुणवत्तापरक शिक्षा देने के दावे बेमानी साबित हो रहे हैं। वहीं छात्र-छात्राओं के अध्ययन के लिए पाठ्य पुस्तक ों एवं अन्य अध्ययन सामग्री के लिए अभिभावकों को अपनी जेबें ढीली करनी पड़ रही हैं। साथ ही छात्र-छात्राओं को उत्कृष्ट अध्ययन सामग्री भी प्राप्त नहीं हो पा रही है।
जिले में चार राजकीय व 7 अनुदानित समेत कुल 102 महाविद्यालय हैं। लेकिन कुछ कालेजों में ही पुस्तकालयों की स्थापना की गई है। अधिकांश महाविद्यालय पुस्तकालय के नाम पर छलावा कर रहे हैं। साथ ही पुस्तकालय के नाम पर छात्र-छात्राओं से महाविद्यालयों द्वारा 50 रुपये फीस की वसूली जा रही है, लेकिन पुस्तकालय न होने की वजह से उन्हें अध्ययन सामग्री व पाठ्य पुस्तक नहीं मिल पा रही है।
ऐसे में अभिभावक एक तरफ महाविद्यालय को पुस्तकालय के नाम पर फीस देते हैं। वहीं उन्हें बच्चों के अध्ययन सामग्री को बाजार से खरीदने के लिए भी पैसा देना पड़ रहा है। जिससे उनके ऊपर आर्थिक बोझ बढ़ गया है। वहीं खास बात यह है कि जिन महाविद्यालयों में पुस्तकालय की स्थापना भी की गई है, वहां पर लाइब्रेरियन नहीं हैं। जिससे पुस्तकों का रखरखाव एवं भंडारण समुचित ढंग से नहीं हो पा रहा है।साथ ही पुस्तकालय संचालन में भी समस्या हो रही है। वहीं छात्र-छात्राओं का दावा है कि व्यवस्थित रखरखाव न होने के कारण लाइब्रेरी कर्मचारी उन्हें पुस्तकें उपलब्ध नहीं करा पाते हैं। मजे की बात यह है कि ढ़ांचागत पुस्तकालय न होने के बावजूद महाविद्यालयों को मान्यता कैसे मिल गई है।
महाविद्यालयों को अपने पुस्तकालय अपडेट रखने तथा आवश्यकता के अनुरुप पाठ्य पुस्तकें सुनिश्चित करने और योग्यताधारियों की नियुक्ति करने के निर्देश दिए गए हैं।
दीप्ति मिश्रा, उप कुलसचिव, राज्य विश्वविद्यालय, इलाहाबाद।