शहरी मैडमों की लेटलतीफी के कारण जिले के दूरदराज इलाकों में स्थित प्राइमरी और मिडिल स्कूलों का शेड्यूल बिगड़ गया है। इन विद्यालयों में तैनात ज्यादातर अध्यापिकाएं या तो शहर की रहने वाली हैं या फिर शहर में किराए के मकान में रहती हैं। जबकि उनकी तैनाती जिला मुख्यालय से 25 से 40 किमी दूरी पर स्थित स्कूलों में है। ऐसे में वे सुबह आठ बजे तक विद्यालय नहीं पहुंच पाती हैं। उन्हें पहुंचने में अक्सर एक-दो घंटे लेट हो जाता है। बीएसए की जांच में भी इसका खुलासा हुआ है। बेसिक शिक्षा अधिकारी के जुलाई और अगस्त महीने में स्कूलों के निरीक्षण के दौरान देरी से आने वाले कुल 103 टीचरों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। इनमें अधिकांश शहर से आने वाली शिक्षिकाएं हैं।
जिले के 2042 प्राइमरी स्कूलों में 6164 और 727 मिडिल स्कूलों में 1068 अध्यापक और अध्यापिकाएं तैनात हैं। इनमें तकरीबन 60 प्रतिशत शिक्षिकाएं हैं। इनमें से अधिकांश टीचर ऐसी हैं जिनकी तैनाती गांव के स्कूलों में हुई है, मगर वे शहर में रहती हैं। शहर में उनके रहने का प्रमुख कारण बच्चों की पढ़ाई और परिवार है। कुछ शिक्षिकाएं ऐसी हैं भी जिनके पति शहर में नौकरी करते हैं। इस कारण पति-पत्नी साथ रहते हैं। बेसिक शिक्षा विभाग ने एक अप्रैल से 30 सितंबर तक सुबह आठ बजे से स्कूल खुलने का समय निर्धारित किया है।
शहर से सटे हुए संडवा चंद्रिका, सदर, मानधाता और बेलखरनाथधाम ब्लाकों के स्कूलों में तैनाती पाने वाली शिक्षिकाओं को सुबह समय से स्कूल पहुंचना बहुत मुश्किल होता है। शहर से 25-40 किमी की दूरी पर स्थित स्कूलों में पहुंचने के लिए अधिकांश शिक्षिकाओं को साधन का ही इंतजार करना पड़ता है। डग्गामार वाहनों को जब तक पूरी सवारी नहीं मिलती है, तब तक चलने को तैयार नहीं होते हैं। इससे स्कूल पहुंचने में उन्हें देरी हो जाती है। बेसिक शिक्षा अधिकारी अजय कुमार सिंह ने बताया कि अधिकांश शिक्षिकाएं शहर से ही नौकरी करती है, इसलिए देर से पहुंचना उनकी आदत बन गई है। उन्होंने बताया कि मैं जब भी स्कूल चेक करने जाता हूं तो सुबह आठ बजे ही पहुंचता हूं। उसमें शहर से आने वाली शिक्षिकाएं ही देर से स्कूल पहुंचने वाली होती हैं। जुलाई और अगस्त में औचक निरीक्षण में 103 अध्यापक-अध्यापकों पर कार्रवाई की गई है, जिसमें से अधिकांश शहर की शिक्षिकाएं हैं।