जनपद में करीब 13 हजार हेक्टेअर जमीन पर आंवले की खेती करने वाले किसान इस बार भी अनदेखी का शिकार होने जा रहे हैं। इस साल आंवले की पैदावार बहुत अच्छी हुई हैं, लेकिन किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। कारोबारियों के साथ ही कंपनियों भी खरीदने के लिए किसानों के पास नहीं आ रही हैं। अभी तक करीब दस प्रतिशत आंवले की बाग का ही सौदा हो सका है। आंवले की अच्छी पैदावार होने के बावजूद आंवले का दाम भी लगातार घटता जा रहा है।
मंडी समिति के मुताबिक जिले में हर साल करीब पचास करोड़ के आंवले का कारोबार है। किसानों को हर साल शासन व प्रशासन की ओर से उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने व उनकी फसल का समर्थन मूल्य घोषित कराने का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन समय के साथ ही सब आंवलों किसानों के दर्द को भूल जाते हैं। इस वर्ष जनपद में लगभग 13 हजार हेक्टेअर से अधिक क्षेत्रफल में अमृतफल की खेती किसानों ने की है। बाग आंवले से लदे हुए हैं, लेकिन व्यापारी गायब हैं। रानीगंज तहसील क्षेत्र के खाखापुर निवासी आंवला किसान रमेश पांडेय ने बताया कि इस बार आंवले की पैदावार अच्छी हुई है। हर पेड़ में 85 प्रतिशत फल की वैरायटी ए ग्रेड की है। अपेक्षाकृत अच्छे मुनाफ का सपना पाले हुए थे। हर साल सितंबर शुरू होने के साथ ही आंवले की बाग कारोबारी या नामी कंपनियों के लोग खरीदने पहुंच जाते थे। किसानों को एडवांस भी दे दिया जाता था। इस बार आंवले की अच्छी पैदावार होने के बावजूद किसानों को खरीदार का इंतजार करना पड़ रहा है। आंवला कारोबारी दिनेश शर्मा ने बताया कि अच्छी फसल के चलते ही इस बार आंवले का रेट भी घट गया है। पहले एक हजार से लेकर बारह सौ रुपये तक में एकपेटी (40 किलो) बिकता था। मौजूदा समय में रेट घटकर 4 सौ रुपये प्रति पेटी पहुंच चुका है। फसल अच्छी हो या खराब हर हाल में खामियाजा आंवला किसानों को ही भुगतना पड़ता है।
कारोबारी अतेन्द्र सिंह का कहना है कि शासन, प्रशासन के छलावे से आंवला किसानों की दशा नहीं सुधर पा रही है। यदि सरकार आंवले का मूल्य निर्धारित कर दे तभी किसानों का फायदा हो सकता है। वहीं बताया जाता है कि अमृत फल की वैरायटी का रेट भी अलग-अलग है। उद्यान अधिकारी रणविजय सिंह ने बताया कि फ्रांसिस, चकइया, एन-7, एन- 10, कृष्णा व कंचन ब्रांड के आंवले का रेट अन्य उपज से अधिक मिलता है। कंपनियों के साथ ही खरीदारों की भी यह वैरायटी पसंद होती है। लक्ष्मी 52 का रेट सबसे अधिक होता है। यह करीब 20 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है। अमृत फल आंवला से मुरब्बा, अचार के साथ ही लड्डू और बरफी ही नहीं बनती। अब तो आंवले से टाफी, कैंडी, जैम जैली, जूस , तेल, समेत अन्य उत्पाद बन रहे हैं। हरे आंवले से लेकर सूखने तक इसका उपयोग किया जाता है। इसके अलावा इसके अंदर की गुठली भी प्रयोग में ले ली जाती है। इन मिठाइयों की मांग अन्य जिलों के साथ ही विदेशों में भी है। यही नहीं खोवा की मिठाइयों की अपेक्षा यह किफायती भी है। वहीं आंवले से बनी शुगरफ्री मिठाई संतृप्त कर देती है। वहीं लोगों का कहना है कि किसानों की हित का ख्याल संबंधित लोगों को रखना चाहिए, जिससे कि उन्हें किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।