सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को खाना देने के नाम पर की जाने वाले मनमानी पर रोक लगाने के लिए डीएम ने नया निर्देश जारी किया है। अब ठेकेदारों को अस्पतालों में भर्ती मरीजों को खाना देने के बाद उनसे पुष्टि भी करानी होगी। उनका मोबाइल नंबर भी दर्ज करना होगा। कभी भी इसकी औचक जांच की जा सकती है। जल्द ही यह प्रक्रिया शुरू होने जा रही है।
जनपद में जिला अस्पताल व जिला महिला अस्पताल के साथ ही 27 सामुदायिक स्वास्थ केंद्र व 54 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। अस्पताल में मरीजों को दवा, जांच सहित सभी स्वास्थ्य सुविधाएं नि: शुल्क दी जाती हैं। इसके अलावा मरीजों को सहूलियत के तौर अस्पतालों में नाश्ता व भोजन दिया जाता है। नाश्ते में मरीजों को दूध, फल व अंडा दिया जाता है जबकि भोजन मरीजों की बीमारी के अनुसार दिया जाता है। इसके लिए विभाग ने ठेका दे रखा है। ठेकेदार मरीजों के भोजन व नाश्ते के वितरण में जमकर खेल करते हैं। कमाई के फेर में गुणवत्ता का तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं।
इतना ही नहीं मरीजों की संख्या में भी खेल करते है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या कुछ और रहती है, जबकि ठेकेदार उसे बढ़ाकर कुछ और दर्शाते हैं। इससे वह रोजाना हजारों का वारा-न्यारा करते हैं। इसकी शिकायतें भी जब-तब अस्पतालों में मरीजों द्वारा की जाती हैं, लेकिन व्यवस्था में सुधार नहीं होता है। मगर अब शासन ने इस पर गंभीरता दिखाई है। ठेकेदारों की मनमानी पर नकेल कसने के लिए इसकी जिम्मेदारी डीएम को सौंपी है। डीएम ने सीएमओ को पत्र लिखकर शासन द्वारा निर्धारित गाइड लाइन के तहत भोजन वितरण कराने को कहा है।
सात ठेेकेदारों को मिली है जिम्मेदारी
जिला व महिला अस्पताल सहित सभी सीएचसी व पीएचसी में मरीजों को भोजन व नाश्ता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सात ठेकेदारों को मिली है। इन सभी ठेकेदारों का क्षेत्र अलग-अलग बंटा हुआ है। एक ठेकेदार जिले का है, बाकी सभी गैर जनपद के हैं।