रात के 11 बज रहे थे। ट्रेन तेज रफ्तार के साथ चली जा रही थी। कामायनी एक्सप्रेस के एस 5 कोच में सवार लगभग सभी यात्री सो रहे थे। कोच की लाइट भी बंद थी। थोड़ी देर में तेज झटका लगा और सभी एक दूसरे से उलझते हुए नीचे जा गिरे। लोगों ने मोबाइल का टार्च जलाकर देखा तो डिब्बे की स्थिति मौत के घर जैसी हो गई थी। दरवाजा कहीं नजर नहीं आ रहा था। सभी ट्रेन को क्या हुआ यह जानने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन पानी गिरने की आवाज के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। यह कहानी बताते हुए कुंडा के अघिया का गौसरजा (24) पुत्र गुलाम रजा गंभीर हो गया। वह अपने रिश्तेदारों के यहां मुंबई घूमने गया था। कामायनी एक्सप्रेस से अपने भाई और कजिन के साथ लौट रहा था। उसने बताया कि आधे डिब्बे में पानी भर गया था।
पानी लगातार भरता जा रहा था। उसने अपने साथ रहे सानाबिल रजा (13) पुत्र मतलूबरजा, राहत फतमा (19) पुत्री गुलामरजा, हस्सान रजा (19)पुत्र अब्दुल माबूद, वकार रजा (18) पुत्र अब्दुल माबूद को खोजा और बाहर निकलने का प्रयास शुरू कर दिया। दरवाजे की खोज की गई तो वह पानी के अंदर था। इसके साथ ही जाम हो गया था। किसी तरह से प्रयास करके एक खिड़की खोली गई और उसके माध्यम से पांचों बाहर निकले। इस दौरान अन्य लोगों को भी बाहर निकाला गया। बाहर निकलते ही उनकी चीख निकल गई। क्योंकि बाहर तो कहीं जमीन थी ही नहीं। डिब्बा नदी में आधा डूबा हुआ था और बाहर जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। सभी किसी तरह से ट्रेन पर चलते हुए पुल पर पहुंचे। इसके बाद कई किमी पैदल चलकर फिरंगी स्टेशन पहुंचे। वहां से ट्रेन से इटारसी पहुंचे। इटारसी में मरहम पट्टी होने के बाद लौटने वाली ट्रेन से सतना पहुंचे, जहां परिवार के लोग उनका इंतजार कर रहे थे।