प्रतापगढ़। अपनी जमीन पर कब्जा पाने के लिए 59 दिनों से कलेक्ट्रेट में सपरिवार धरने पर बैठी महिला ने जान देने का ऐलान किया तो प्रशासन के होश उड़ गए। आनन फानन में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। पौने दो घंटे बाद तुरंत कब्जा दिलाने का आश्वासन देकर वकीलों ने उसे नीचे उतारा।
अंतू थाना क्षेत्र के कल्यानपुर मौरहा गांव निवासी पारसनाथ की पत्नी केवला देवी (50) की जमीन पर पड़ोसी ने कब्जा कर लिया है। इसे लेकर उनमें विवाद हुआ और कई बार नाप की गई। वर्ष 2006, 2009 में प्रशासन ने नाप के बाद उसे कब्जा भी दिलाया लेकिन विरोधियों ने हर बार बेदखल कर दिया। केवला देवी अपने बेटे नीरज, बहू कंचन और दो साल के पौत्र के साथ 59 जिला कचहरी में धरना दे रही है। मंगलवार को उसके बेटे ने आत्मदाह करने की चेतावनी दी थी। सुबह एसओ अंतू पहुंचे और नीरज को उठा ले गए। केवला देवी अपनी बहू के साथ धरनास्थल पर बैठी रही। सुबह करीब साढे़ 10 बजे वह जान देने के इरादे से कलेक्ट्रेट की छत पर चढ़ गई। सूचना पर सीओ सिटी ज्ञानेंद्र नाथ प्रसाद, शहर कोतवाल कुलदीप तिवारी के साथ कई चौकी प्रभारी मौके पर पहुंचे। महिला हिरासत में लिए गए अपने बेटे नीरज को वापस बुलाने की मांग कर रही थी। करीब सवा 12 बजे अंतू एसओ नीरज को लेकर आए तो कुछ वकीलों ने उसे नीचे उतारा। इसके बाद उसकी जमीन की नाप करने के लिए टीम भेजी गई। हालांकि उसे कब्जा नहीं मिल सका।
एसडीएम सदर संजय कुमार खत्री का कहना है कि कलेक्ट्रेट में छत पर चढ़ने वाली महिला के बेटे नीरज की मांग पर कई बार नाप हो चुकी है। उसने खुद चरागाह की जमीन पर कब्जा कर रखा है। ऐसे में उसे कब्जा दिलाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। मंगलवार को जिस समय महिला कलेक्ट्रेट की छत पर चढ़ी उससे पहले ही राजस्व टीम उसके घर पैमाइश करने गई थी।
जिस समय केवला देवी देवी छत पर चढ़ी थी, उसी दौरान अंतू के छतरपुर चौहान का पुरवा की एक और महिला उसके पास पहुंच गई। वह अपनी समस्या बता रही थी लेकिन उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया। वह कुछ देर बाद उतर आई। इस महिला की बेटी को 2007 में एक व्यक्ति भगा ले गया था। उसका अब तक कोई पता नहीं चल सका। पुलिस ने इस मामले में आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। महिला का 19 साल का बेटा भी 5 मई 2013 को गायब हो गया। पुलिस उसकी तलाश के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है। वह मंगलवार को कलेक्ट्रेट आई और इंसाफ मांगने के लिए केवला देवी के साथ कलेक्ट्रेट की छत पर पहुंच गई। हालांकि कुछ देर बाद वह खुद ही उतर गई। उसकी शिकायत अनसुनी ही रह गई।