आप स्कूलों की जो तस्वीर देख रहे हैं, इनमें भारत के भविष्य कहे जाने वाले नन्हें बच्चे शिक्षा अर्जित करते हैं। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को मुफ्त में किताब, ड्रेस, जूता-मोजा के साथ ही दोपहर का भोजन भी मिलता है, मगर जर्जर भवन को ठीक कराने की कोई पहल नहीं हो रही है।
जिले में 421 ऐसे स्कूल हैं, जहां जर्जर भवन के नीचे बैठकर बच्चे पढ़ाई करते हैं। लालगंज विकास खंड के धधुवा ही नहीं, बल्कि रामपुर संग्रामगढ़ के प्राइमरी स्कूल पूरे अनिरुद्ध में निर्माणाधीन प्रवेश द्वार गिरने से छात्र की मौत हो गई थी। इसके बाद भी विभाग सबक नहीं सीख रहा है।
गौरा विकास खंड के मिडिल स्कूल पटहटियाकला इतना जर्जर है कि बच्चों की बात तो दूर रही, शिक्षक भी बैठने से डरते हैं। प्राइमरी स्कूल पटहटियाकला में बना भवन बेहद जर्जर हो गया है। इसके बावजूद भवन में बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं। जिले के बाबागंज विकास खंड का प्राइमरी स्कूल कोटाभवानीगंज, मिडिल स्कूल अधिया बेहद जर्जर अवस्था में है।
बच्चे ही नहीं, अध्यापक जहां बैठकर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, वह बीआरसी भवन भी वर्षों से जर्जर है, मगर मरम्मत के दिशा में कोई पहल नहीं हुई। यह तो महज उदाहरण हैं, जिले में सैकड़ों स्कूल भवन ऐसे हैं, जो जर्जर अवस्था में हैं। किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है।
विभागीय आंकड़ों पर गौर किया जाय तो जिले में 421 स्कूल जर्जर अवस्था में हैं। दरअसल में नए स्कूल भवन निर्माण पर आठ साल से रोक लगी हुई है। मगर मरम्मत के लिए आने वाली धनराशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। वर्ष 2018-19 में 1.23 करोड़ रुपये स्कूलों को भेजकर मरम्मत करने के साथ ही लकदक करने को कहा गया था। मगर अधिकांश अध्यापकों ने रुपये का दुरुपयोग कर जेब भरी और उन्होंने स्कूल भवन की दशा सुधारने की दिशा में कोई पहल नहीं किया।
निरर्थक साबित हुई कायाकल्प योजना
जिले के प्राइमरी और मिडिल स्कूलों की दशा सुधारने के लिए जिले में कायाकल्प योजना प्रारंभ की गई थी। मगर अधिकांश प्रधानों की दबंगई के चलते कुछ स्कूल ऐसे हैं, जहां अभी तक एक भी रुपये नहीं खर्च किए गए हैं। इससे इन स्कूलों की दशा में सुधार नहीं हो पा रहा है।
घटिया निर्माण सामग्री से बने हैं भवन
बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूल भवन बनाने की जिम्मेदारी अध्यापकों को ही दी जाती थी। इससे टीचर अधिकारियों को कमीशन देकर घटिया भवन का निर्माण कराते थे। अधिकांश भवन तो ऐसे हैं, जो दस साल भी नहीं चल पाए और उनकी दशा दयनीय हो गई है।
जिले में जर्जर भवनों की सूची तैयार करके शासन से मरम्मत के लिए धनराशि की मांग की जाएगी। जब तक भवन का निर्माण नहीं होता है, तब तक हेडमास्टर की जिम्मेदारी है कि वह जर्जर भवन में बच्चों को कदापि न बैठाए। स्कूल में बने अतिरिक्त कक्ष में पठन-पाठन करें।
अशोक कुमार सिंह। , बीएसए