फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

421 जर्जर भवनों में जिंदगी दांव पर रखकर बच्चे कर रहे पढ़ाई

Thu, 28 Feb 2019 08:50 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रतापगढ़
विज्ञापन
जर्जर भवन - फोटो : प्रतापगढ़
विज्ञापन

विज्ञापन
 आप स्कूलों की जो तस्वीर देख रहे हैं, इनमें भारत के भविष्य कहे जाने वाले नन्हें बच्चे शिक्षा अर्जित करते हैं। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को मुफ्त में किताब, ड्रेस, जूता-मोजा के साथ ही दोपहर का भोजन भी मिलता है, मगर जर्जर भवन को ठीक कराने की कोई पहल नहीं हो रही है।

जिले में 421 ऐसे स्कूल हैं, जहां जर्जर भवन के नीचे बैठकर बच्चे पढ़ाई करते हैं। लालगंज विकास खंड के धधुवा ही नहीं, बल्कि रामपुर संग्रामगढ़ के प्राइमरी स्कूल पूरे अनिरुद्ध में निर्माणाधीन प्रवेश द्वार गिरने से छात्र की मौत हो गई थी। इसके बाद भी विभाग सबक नहीं सीख रहा है।
विज्ञापन


गौरा विकास खंड के मिडिल स्कूल पटहटियाकला इतना जर्जर है कि बच्चों की बात तो दूर रही, शिक्षक भी बैठने से डरते हैं। प्राइमरी स्कूल पटहटियाकला में बना भवन बेहद जर्जर हो गया है। इसके बावजूद भवन में बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं। जिले के बाबागंज विकास खंड का प्राइमरी स्कूल कोटाभवानीगंज, मिडिल स्कूल अधिया बेहद जर्जर अवस्था में है।

बच्चे ही नहीं, अध्यापक जहां बैठकर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, वह बीआरसी भवन भी वर्षों से जर्जर है, मगर मरम्मत के दिशा में कोई पहल नहीं हुई। यह तो महज उदाहरण हैं, जिले में सैकड़ों स्कूल भवन ऐसे हैं, जो जर्जर अवस्था में हैं। किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है।

विभागीय आंकड़ों पर गौर किया जाय तो जिले में 421 स्कूल जर्जर अवस्था में हैं। दरअसल में नए स्कूल भवन निर्माण पर आठ साल से रोक लगी हुई है। मगर मरम्मत के लिए आने वाली धनराशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। वर्ष 2018-19 में 1.23 करोड़ रुपये स्कूलों को भेजकर मरम्मत करने के साथ ही लकदक करने को कहा गया था। मगर अधिकांश अध्यापकों ने रुपये का दुरुपयोग कर जेब भरी और उन्होंने स्कूल भवन की दशा सुधारने की दिशा में कोई पहल नहीं किया।

निरर्थक साबित हुई कायाकल्प योजना
जिले के प्राइमरी और मिडिल स्कूलों की दशा सुधारने के लिए जिले में कायाकल्प योजना प्रारंभ की गई थी। मगर अधिकांश प्रधानों की दबंगई के चलते कुछ स्कूल ऐसे हैं, जहां अभी तक एक भी रुपये नहीं खर्च किए गए हैं। इससे इन स्कूलों की दशा में सुधार नहीं हो पा रहा है।

घटिया निर्माण सामग्री से बने हैं भवन
बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूल भवन बनाने की जिम्मेदारी अध्यापकों को ही दी जाती थी। इससे टीचर अधिकारियों को कमीशन देकर घटिया भवन का निर्माण कराते थे। अधिकांश भवन तो ऐसे हैं, जो दस साल भी नहीं चल पाए और उनकी दशा दयनीय हो गई है।
विज्ञापन


जिले में जर्जर भवनों की सूची तैयार करके शासन से मरम्मत के लिए धनराशि की मांग की जाएगी। जब तक भवन का निर्माण नहीं होता है, तब तक हेडमास्टर की जिम्मेदारी है कि वह जर्जर भवन में बच्चों को कदापि न बैठाए। स्कूल में बने अतिरिक्त कक्ष में पठन-पाठन करें।
अशोक कुमार सिंह। , बीएसए
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें