राजनीति में वंशवाद को लेकर देशभर में बहस छिड़ी हुई है। ऐसे में प्रतापगढ़ भी इससे अछूता नहीं रह सकता है। यहां की सियासत में वंशवाद फला-फूला और खूब चला। जिले के मतदाताओं ने भी वंशवाद की राजनीति को पसंद किया। दिल खोलकर गले लगाया। देश की दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा ने भी वंशवाद की राजनीति को बढ़ावा दिया। यही कारण रहा कि पिता के बाद उनके बेटे-बेटियों ने सियासत की विरासत संभाली।
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। 1967 के आम चुनाव में कालाकांकर राजघराने की सियासत में इंट्री के साथ ही जिले की राजनीति में वंशवाद के बीज पड़ गए। प्रतापगढ़ संसदीय सीट शुरुआत से कांग्रेस से जुड़े रहे इस राजघराने के कब्जे में सात बार रही। एक दौर था जब यहां की सियासत इसी राजघराने के इर्द-गिर्द सिमटकर रह गई थी। 1962 में जनसंघ के हाथों हार के बाद 1967 के चुनाव में राजा दिनेश सिंह ने कांग्रेस में फिर से जान फूंकी और लंबे समय तक अपना दबदबा बनाए रखा। पूर्व विदेश मंत्री दिनेश सिंह चार बार जिले के सांसद रहे। 1967, 71, 84 और 1989 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने प्रतापगढ़ संसदीय सीट से जीत हासिल की और कांग्रेस का परचम बुलंद किया।
हालांकि इमरजेंसी के बाद देश में कांग्रेस विरोधी लहर में 1977 के आम चुनाव में राजा दिनेश सिंह को भी हार का सामना करना पड़ा। बीएलडी के रूपनाथ सिंह यादव ने उन्हें शिकस्त दी। इस हार के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और फिर जनता पार्टी से राज्यसभा चले गए। 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। इस पर वह आईएनपी से मैदान में उतरे, लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर राजा दिनेश प्रताप ङ्क्षसह को प्रतापगढ़ संसदीय सीट से प्रत्याशी बनाया और इस बार जनता ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। वह तीसरी बार प्रतापगढ़ के सांसद बने। 1989 के चुनाव में भी उन्हें जीत हासिल हुई। राजा दिनेश ङ्क्षसह के निधन के बाद कांग्रेस ने उनकी बेटी राजकुमारी रत्ना सिंह को उनका उत्तराधिकारी बनाया और 1996 के लोकसभा चुनाव में प्रतापगढ़ संसदीय सीट से मैदान में उतारा। अपने पहले ही चुनाव में रत्ना सिंह ने जीत हासिल की। वह 1996, 1999 और 2009 में तीन बार जिले की सांसद रहीं। 1998, 2004 और 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा। इसके बाद भी कांग्रेस नेतृत्व का उन पर भरोसा कायम है। 2019 के चुनाव के लिए पार्टी ने उन्हें फिर से प्रत्याशी बनाया है।
वंशवाद की दूसरी कड़ी प्रतापगढ़ राजघराने से जुड़ी है। 1962 में इस राजघराने के राजा अजित प्रताप सिंह ने जनसंघ के टिकट पर तब चुनाव लड़ा जब वह राजनीति में अपना अस्तित्व बनाने के लिए जूझ रहा था। खुद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी राजा अजित प्रताप सिंह को टिकट देने के लिए प्रतापगढ़ आए थे। उन्होंने जनसंघ के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और मुनीश्वरदत्त उपाध्याय जैसे जमीन से जुड़े नेता को हराकर पहली ही बार में विजय हासिल की। 1980 के लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर फिर सांसद चुने गए। 1991 के चुनाव में राजा अजित प्रताप सिंह के बेटे अभय प्रताप सिंह जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़े और सांसद बने। अभय प्रताप के बेटे अनिल प्रताप सिंह भी लंबे समय से राजनीति में हैं। वह दो बार कांग्रेस से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन उन्हें जीत नहीं हासिल हुई।
दस बार राजघराने से सांसद
प्रतापगढ़ संसदीय सीट पर रजवाड़ों का शुरू से दखल रहा है। लोकसभा चुनाव में दस बार राजघरानों ने जीत हासिल की। इसमें सात बार अकेले कालाकांकर राजघराने का कब्जा रहा है। चार बार राज दिनेश सिंह और तीन बार उनकी बेटी रत्ना सिंह सांसद रही हैं। तीन बार प्रतापगढ़ राजघराने ने संसदीय सीट पर अपना दबदबा कायम किया।