बारूद के ढेर पर बस्तियां
दशहरा और दीपावाली के लिए भारी मात्रा में बारूद और पटाखे किए गए हैं डंप
घनी बस्तियों के बीच रखे गए पटाखे, कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। जिले की कई घनी बस्तियां बारूद के ढेर पर हैं। दशहरा और दीपावली के लिए हवाईदारों ने बड़ी मात्रा में घनी बस्तियों के बीच पटाखे और बारूद डंप किए गए हैं। कई जगहों पर अवैध रूप से पटाखे तैयार किए जा रहे हैं। बगैर लाइसेंस के ही कुछ आतिशबाज घनी बस्तियों में भारी मात्रा में पटाखा डंप कर रहे हैं। इससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। जिम्मेदार अफसरों ने सबकुछ जानते हुए भी मौन साध रखा है। यह हाल तब है कि जब बीते सालों में कई बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। पटाखा बनाते समय विस्फोट से कई लोग अपनी जान भी गंवा चुके हैं। उदयपुर में हुए पटाखा विस्फोट ने फिर प्रशासन की लापरवाही उजागर कर दी है।
शहर से लेकर गांव तक दशहरा और दिवाली के पर्व पर करोड़ों रुपये के पटाखे की बिक्री होती है। दशहरा और दीपावाली का त्यौहार करीब आ रहा है। इसको लेकर ज्यादातर हवाईदार अभी से ही तेज आवाज वाले पटाखे बनाने के साथ ही उसे डंप करने लगे हैं। पटाखों को अपने घर पर या फिर घनी बस्ती में चोरी छिपे बनाने के साथ ही गोदामों में बारूद डंप किया जाता है। पुलिस से बचने के चक्कर में दिन में गोदाम में ताला लटकाकर बगल हो जाते हैं। रात होते ही तैयार पटाखों को गोदाम में रखने लगते हैं। इस बात की जानकारी लोगों को होती है, लेकिन सभी अंजान बने रहते हैं। पटाखा गोदाम के अगल-बगल रहने वाले लोग सहमे रहते हैं। पूर्व में गोदाम से लेकर घरों व टेंपो में हुए पटाखा विस्फोट में कई लोागें की जानें जा चुकी हैं। परिवार के लोगों की जान जाने के बाद भी आतिशबाज अपना कारोबार सुरक्षित करने के बजाय रिस्क लेकर करते रहते हैं। उनके भीतर प्रशासनिक अधिकारियों का भय भी नहीं है। हर साल बड़ा हादसा होने पर अफसरों की नींद खुलती है। जिम्मेदार अधिकारी पहले तो कार्रवाई करने की बात कहते हैं और कुछ दिनों बाद भूल जाते हैं।
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इन घनी बस्तियों में डंप हो रहे पटाखे
शहर के भैरोपुर, तेलिया चौराहा, बेगमवार्ड, जेलरोड, कटरामेदनीगंज, रानीगंज, सुलतानपुर, दुर्गागंज, गड़वारा, लालगंज, सुवंसा, कटरागुलाबसिंह, पट्टी, कुंडा जैसे घनी बस्ती में आतिशबाज पटाखा तैयार करना शुरू कर दिए हैं। उसे घर के अंदर या फिर बस्ती से सटाकर अपने गोदाम में डंप कर रहे हैं।
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डंप पटाखों ने अब तक ली है 25 लोगों की जान
जनपद में बनने वाले पटाखों ने अब तक 25 से अधिक लोगों की जान ली है। 19 सितंबर 2005 को बडनपुर में पटाखों से भरी टेंपो में विस्फोट हो गया था। जिमसे महिला समेत तीन लोगों की मौत हो गई थी और पांच लोग घायल हुए थे। 12 अक्तूबर 2007 में बेगमवार्ड में हुए पटाखा विस्फोट में तीन लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। मोहर्रम गंभीर रूप से घायल हो गया था। 27 अप्रैल 2015 में राजाराम जायसवाल के घर में विस्फोट हुआ था। कई लोग घायल हुए थे। 1 जून 2013 को कटरागुलाब सिंह बाजार में आतिशबाज के घर में हुए पटाखा विस्फोट में लड्डन, शकीला समेत चार लोगों की जान चली गई थी। इसके अलावा नारायणपुर, सुवंसा में भी लोगों की जानें जा चुकी हैं। श्याम बिहारी गली में भी पटाखे की दुकान में आग लग चुकी है। कटरामेदनीगंज में भी रिहायशी बस्ती में डंप पटाखों में आग लग चुकी है। उदयपुर में पटाखों के विस्फोट ने एक बार फिर प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है।
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फायर ब्रिगेड को नहीं पता लाइसेंसधारी जीवित हैं या मृत
दशहरा का पर्व पांच दिन बाद होना है। अब तक जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधकर बैठे थे। त्यौहार करीब आ गया तो वह जांच शुरू करने का दावा कर रहे हैं। प्रशासन के रिकार्ड में भी मृत लोगों को जिंदा माना जा रहा है। फायर ब्रिगेड के पास जो सूची है, उसमें जिले के 170 आतिशबाजों को लाइसेंस जारी किया गया है। जिसमें कौन जिंदा है और कौन दुनिया से कूच कर चुका है, इसकी जानकारी फायरब्रिगेड को नहीं है। परिवार के सदस्यों के नाम पर जारी लाइसेंस पर आज भी उनके परिवार के लोग पटाखा तैयार करके घनी बस्तियों में डंप कर रहे हैं। बताते हैं कि जब पटाखा बनाने के लिए लाइसेंस जारी किया गया था, उस समय घनी बस्ती नहीं थी। अब घनी बस्ती होने के बाद भी उसी गोदाम पर उनके लाइसेंस का नवीनीकरण कर दिया जाता है।
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क्या है नियम
आतिशबाजों का लाइसेंस जारी करते समय उनसे शपथपत्र लिया जाता है। शपथ पत्र में यह देना होता कि उनका गोदाम कहां बनाया गया है। जिन स्थानों पर पटाखा बनाया जाएगा, वहां गोदाम नहीं होगा। गोदाम को घनी बस्ती से करीब एक से डेढ़ किमी दूर बनाने का निर्देश दिया जाता है। गोदाम के पास अग्निशमन यंत्र रखने का निर्देश दिया जाता है।
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लाइसेंसियों को मिलता है हर सीजन में 15 किलो बारूद
अग्रिशमन विभाग की मानें तो जनपद में कुल 170 लाइसेंसी हैं। जो पर्व या शादी-ब्याह में पटाखा बनाने का कारोबार करते हैं। हकीकत यह है कि लाइसेंसी की आड़ में पूरा परिवार पटाखा बनाता है। अब तो वे आसपास के लोगों को भी पटाखा बनाने के लिए बुलाते हैं। जो पटाखा बनाने में दक्ष नहीं होते। आतिशबाज मोहम्मद मूसा की मानें तो शहर के चौक घंटाघर पर तुलसीराम की दुकान पर बारूद व उसका केमिकल मिलता है। लाइसेंस दिखाने पर उसे सीजन में 15 किलो बारूद व केमिकल मिल जाया करता है।
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ऐसे होता है पटाखों का निर्माण
0 लोकल पटाखों में मानक से नहीं बल्कि अंदाजा लगाकर बारूद भरा जाता है।
0 मानक के विपरीत होने के कारण कभी पटाखा तेज आवाज में फटता है, तो कभी फुस्स हो जाता है।
0 लोकल पटाखों की आवाज का आकलन नहीं होता।
0 बारूद अधिक मात्रा में भरे जाने से मंडराता रहता है खतरा।
वर्जन-----
जिनका लाइसेंस बना है उसमें से कुछ लोगों की मौत हो गई है। क्षेत्र में भ्रमण करके उनका लाइसेंस निरस्त किया जा रहा है। साथ ही घनी बस्ती में पटाखा गोदाम की भी जांच की जा रही है। रिकार्ड के मुताबिक कुल 170 लाइसेंसी हैं।
महेंद्र कुमार, प्रभारी अग्निशमन अधिकारी सदर।