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चुनाव में उलझे अफसर, रुपये का बंदरबांट कर रहे कर्मचारी

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चुनाव में उलझे अफसर, रुपये का बंदरबांट कर रहे कर्मचारी
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फरवरी में मिले 586.21 करोड़ रुपये का नहीं मिल रहा हिसाब
खड़े हो गए हैंडपंप, रीबोर कराने को तैयार नहीं हैं प्रधान
अमर उजाला ब्यूरो
प्रतापगढ़। जिले के अफसर चुनावी समर में डूबे हुए हैं। इससे ग्रामीण इलाकों में विकास कार्य ठप हो गया है। फरवरी माह में चौदहवें वित्त आयोग से मिले 586.21 करोड़ रुपये का भुगतान तो कर लिया गया है, मगर अधिकांश ग्राम पंचायतें यह नहीं बता पा रही हैं कि किस मद में और कितना खर्च किया है। इधर जलस्तर नीचे खिसकने से पीने के पानी का संकट गहरा गया है।
जिले में छह और बारह मई को होने वाले मतदान के लिए शीर्ष अधिकारी दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। अफसरों की व्यस्तता से ग्राम पंचायतों में विकास कार्य पूरी तरह ठप हो गए हैं। ग्राम पंचायतों को विकास कार्य कराने के लिए जो धनराशि मिली थी, उसका बंदरबांट कर लिया गया है। डीपीआरओ की मानें तो फरवरी माह में चौदहवें वित्त आयोग के तहत 586.21 करोड़ रुपये जिले की 1255 ग्राम पंचायतों में भेजे गए हैं। अधिकांश ग्राम पंचायतों ने कागज पर संपूर्ण धनराशि का सदुपयोग कर लिया है, मगर आनलाइन फीडिंग नहीं कराई है। इसकी वजह और कुछ नहीं, बल्कि फर्जी बिल-बाऊचर तैयार किया जाना है। फिलहाल इन दिनों जलस्तर नीचे खिसकने से हैंडपंपों के खड़े होने से पेयजल का संकट गहरा गया है। प्रधानों ने हैंडपंप का रीबोर कराने से यह कहकर हाथ खड़े कर दिए हैं कि बजट नहीं मिला है।
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इनसेट----
बिल-बाउचर करना पड़ता है आनलाइन
चौदहवें वित्त आयोग के तहत जो धनराशि ग्राम पंचायतों को मिलती है और जो रुपये खर्च होते हैं, उसका बिल-बाउचर आनलाइन करना होता है। अगर ग्राम पंचायतें ऐसा नहीं करती हैं तो वह संदेह के दायरे में आती हैं और उनके विकास कार्यों की जांच कराई जाती है।
इनसेट-----
हैंडपंपों के रीबोर के लिए और कोई योजना नहीं
ग्रामीण इलाकों में हैंडपंप रीबोर के लिए कोई योजना नहीं है। जल निगम को पहले यह अधिकार दिया गया था। मगर बाद में शासन ने रीबोर कराने का अधिकार ग्राम पंचायतों को दे दिया।
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वर्जन----------
गांव में खराब हैंडपंपों को अविलंब ठीक कराने के लिए सभी ग्राम पंचायतों से कहा गया है। अगर किसी ग्राम पंचायत में धनराशि नहीं है तो उसे चुनाव बाद भुगतान किया जाएगा। जो स्कूल बूथ बने हुए हैं, उनके हैंडपंप अविलंब ठीक कराए जाएं।
उमाकांत पांडेय, डीपीआरओ
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