तराई में बाघ के हमले बढ़ने के साथ ही ग्रामीणों में गुस्सा भी बढ़ रहा
नेपाल सीमा से सटे तराई इलाके के जंगल में बाघ के हमलों की घटनाएं नई नहीं हैं। फर्क इतना है कि पहले साल में एक दो घटनाएं होती थीं लेकिन अब नौ माह में बाघ ने 15 इंसानों को शिकार बनाया। इससे इलाके में जहां दहशत है, वहीं वन विभाग के अफसर भी चिंतित हैं। इन घटनाओं के बाद आक्रोशित भीड़ कभी वनकर्मियों पर हमला कर देती है तो कभी हाईवे जाम कर गुस्से का इजहार कर रही है। कई माह पहले एक बाघ को नरभक्षी घोषित कर लखनऊ के चिड़िया घर भी भेजा गया। सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक बाघ इंसान की जिंदगी को खत्म करते रहेंगे? आखिर कब वन विभाग बाघ को नरभक्षी घोषित कर उनके आतंक से लोगों को निजात दिलाएगा? वन विभाग के अधिकारी इन सवालों का जवाब पूछने पर या तो चुप्पी साध जाते हैं या फिर बजट, स्टाफ का रोना रोतो हैं।
पीलीभीत के जंगलों को तीन साल टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। इससे कुछ दिन पूर्व यह वन्यजीव विहार के रूप में भी रहा, लेकिन वन्यजीव विहार और टाइगर रिजर्व बनने के बाद भी व्यवस्थाओं और आम जनता की सुरक्षा के नाम पर कुछ भी नहीं है। लगातार बढ़ती संख्या के चलते बाघ अब जंगल से बाहर आने लगे हैं। इसमें जंगल किनारे तेजी से बढ़ रहे गन्ने का क्षेत्रफल बाघों को प्रकृति वास का आभास दिला रहा है, जिससे बाघ इन गन्ने के खेतों में छिपकर शिकार कर रहे हैं। पशुओं पर हमले के साथ मानव बाघ संघर्ष की घटनाएं भी लगातार बढ़ी हैं। पिछले नौ माह के आंकड़ों की बात करें तो अब तक 15 लोगों की जानें जंगल के बाहर और अंदर हुए हमलों में जा चुकी हैं। जिसमें एक वनवाचर भी शामिल हैं, साथ ही कई लोग घायल हो चुके है। वनविभाग मृतक के परिवारीजनों को मुआवजा देकर उनके आंसू पोंछने का प्रयास तो करता है लेकिन हमलों पर अंकुश लगाने की कोई प्रभावी योजना अब तक सफल होती नहीं दिखी है। संसाधनों के अभाव में केवल बैठकों और दिखावटी भागदौड़ के अलावा कुछ भी ठोस कार्रवाई नहीं पा रही है।