पीलीभीत। कोरोना वायरस भले ही देश और दुनियां में तबाही का मंजर लेकर आया। मगर प्राकृतिक रूप से वायु और जल प्रदूषण रोकने में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कोरोना की वजह से देश में चले 68 दिन के लॉकडाउन में देवाहुति गंगा (देवहा) और गोमती नदी का जल निर्मल हो गया। एयर क्वालिटी इंडेक्स भी 190 से घटकर सामान्य से नीचे 50 तक चला गया। अब इसे बरकरार रखने के लिए फैक्टरियों और गंदे नालों का प्रदूषित जल नदियों में जाने से रोकने के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाना जरूरी है।
लॉकडाउन में फैक्टरियां, सड़क और पुल के निर्माण कार्य बंद होने और डीजल पेट्रोल के वाहन न चलने से वायु और जल प्रदूषण की मात्रा 90 फीसदी तक कम हो गई। माहौल ऐसा बना कि दोनों नदियों देवहा और गोमती का जो जल प्रदूषण की वजह से काला पड़ चुका था, वह स्वच्छ हो गया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, लॉकडाउन के समय नदियों की स्वच्छता और निर्मलता आगे बरकरार रखने के लिए फैक्टरियों का केमिकलयुक्त जल और गंदे नालों का पानी मिलने से रोकने के लिए सीवर ट्रीटमेंट प्लांट ही एकमात्र उपाय है। इसके साथ ही छोटी बड़ी सभी फैक्ट्रियों में निर्धारित मानक के अनुरूप इफ्यूलेंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) लगाकर उससे निकलने वाले प्रदूषित जल को शुद्ध करके छोड़ा जाए। वायु प्रदूषण रोकने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन बढ़ाना होगा क्योंकि डीजल पेट्रोल के वाहनों से एयर क्वालिटी इंडेक्स बढ़कर दो से तीन गुना हो जाता है। इससे हवा जहरीली हो जाती है।
लॉकडाउन में निर्मल हो गया देवहा और गोमती का जल
जनपद की लाइफ लाइन कही जाने वाली देवहुति गंगा (देवहा) नदी उत्तराखंड के पहाड़ों से निकलकर पीलीभीत, बीसलपुर होते हुए शाहजहांपुर में ढाई घाट पर पहुंचकर गंगा में विलीन हो जाती है। देवहा का पानी कभी इतना स्वच्छ और पवित्र था कि श्रद्धालु उसे गंगाजल की तरह से पान करते थे। मगर, नदी में गिरने वाले छह नालों के अलावा घरेलू और कारखानों का कूड़ा, प्लास्टिक और मेडिकल कचरा समेत अन्य अपशिष्ट भी देवहा नदी में पहुंचने लगे। शहर भर का कूड़ा पवित्र नदी के तलहटी में डाला जाने लगा तो देवहा का पानी प्रदूषित होने के साथ उसका रंग भी काला पड़ गया। यही हाल गोमती नदी का हुआ। माधोटांडा के समीप फुल्हर झील में गोमती का उद्गम स्थल माना जाता है। हालांकि गोमती नदी का बहाव यहां से नहीं होता है, मगर यहां गोमद ताल है। इसका पानी भी प्रदूषित हो चुका था। लॉकडाउन में यह जल पहले की तुलना में निर्मल हो गया।
बिना खर्च लॉकडाउन में घट गया प्रदूषण
कोरोना संक्रमण के लॉकडाउन में सड़कों पर वाहनों की आवाजाही बंद रही। इक्का दुक्का वाहन ही गुजरे। दो माह से अधिक समय तक कारखाने बंद रहे। इससे प्रदूषण में खासी कमी देखी गई। नतीजा यह निकला कि दोनों नदियां देवहा और गोमती स्वच्छ हो गईं। नदी किनारे कपड़ों का धुलना और जानवरों का पहुंचना भी बंद रहा। कारखाने बंद होने से कचरा भी नहीं पहुंचा।
समाधान विकास समिति की अध्यक्ष उर्मिला देवी ने अनुसार नदियों के जल के गुणवत्ता के मानक जैविक ऑक्सीजन की मांग, पीएच मान, घुलनशील ऑक्सीजन, गंदलापन और कोलीफार्म पर निर्भर है। 68 दिन के लॉकडाउन में जल के अंदर घुली आक्सीजन का प्रयोग घटा। निरंतर बहाव की वजह से अपशिष्ट बहते गए। जल शुद्ध हो गया। जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 3.0 मिलीग्राम /लीटर से अधिक रह गई। कपड़े न धुलने से जल का पीएच मान 6.5 से 8.5 के बीच है। कोलीफार्म स्तर भी नियंत्रित है। इस वजह से देवहा और गोमती नदी के प्रदूषण में कमी आई। अब दोनों नदियों का पानी स्नान योग्य है। अगर यह निरंतरता बनी रहे तो यह जल पीने योग्य हो सकेगा।
पर्यटन स्थल के रुप में विकसित हो गोमती उद्गम स्थल
नदियों के स्वच्छ और निर्मल अभियान से जुड़े बाबा प्रवक्ता नंद का कहना है कि अगर सरकार हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए गोमती उद्गम स्थल विकसित करने का प्रयास करे तो संत समाज भी उसके साथ खड़ा होगा। नदियों का जल स्वच्छ रखने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास न के बराबर हैं। उसमें सिर्फ बजट ठिकाने लगता है। ईमानदारी से नदियों की स्वच्छता के अभियान चलें तो संत समाज और जनता दोनों का सहयोग रहेगा। गोमती उद्गम स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना चाहिए।
नदियों में लॉकडाउन जैसी स्वच्छता बरकरार रखने के लिए फैक्टरियों में निर्धारित मानक के ट्रीटमेंट प्लांट लगाने होंगे। उनका केमिकल और नालों का पानी नदियों में जाने से रोकना होगा। बहाव तेज करना होगा। बिजली के वाहन चलने से जल और वायु दोनों तरह के प्रदूषण में कमी आएगी। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को जागरूकता दिखाने की जरूरत है। - रोहित सिंह, क्षेत्रीय अधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड