पीलीभीत। तराई के इस जिले में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी है। मंडल के अन्य जिलों की बात करें तो यहां पानी का पर्याप्त भंडार भी है। मगर भूगर्भ जल के संरक्षण पर कोई ध्यान नहीं है। जिसके कारण जिले के सात ब्लॉकों में से कुछ ब्लॉकों की स्थिति चिंताजनक है। पिछले तीन वर्षों में सीमा क्षेत्र के समीप स्थित अमरिया और बिलसंडा ब्लॉक में भूगर्भ जल का ग्राफ 2 से 3 फुट गिरा है। हालांकि अभी जनपद का कोई भी ब्लॉक अतिदोहित की श्रेणी में नहीं आता। विशेषज्ञों का कहना है कि भूगर्भ जल की विकास दर सबसे कम जनपद में ही है। जिस तरह से जनपद में पानी का दोहन हो रहा है तो भविष्य में यहां अन्य महानगरों जैसे हालात हो सकते हैं।
सबमर्सिबल पंपों से खाली की जा रही धरती की कोख
शहर के जलकल विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो ढाई लाख की आबादी वाले शहर में मात्र 10, 700 हजार घरेलू उपभोक्ता ही हैं। जबकि 410 कामर्शियल उपभोक्ता है। पालिका इनसे जलमूल्य वसूलती है। शहर में नौ वाटर प्लांट, 50 से अधिक कार वाशिंग सेंटर, सात बड़े होटल, दर्जनों नर्सिंगहोम और अस्पताल हैं और यहां सबमर्सिबल पंपों से अंधाधुंध पानी को दोहन भी होता है, लेकिन पालिका की निगाह में होने के बाद भी यह जलमूल्य के दायरे से बचे हैं। पालिका सिर्फ 11 कार वाशिंग सेंटर और नौ वाटर प्लांट से ही जलमूल्य वसूलती है।
गांव देहात में होती है पानी की बेहिसाब बर्बादी
ग्रामीण अंचलों में नहरों और ट्यूबवेल के माध्यम से सिंचाई होती है। खास बात यह है कि जिम्मेदार विभागों को हीं नहीं मालूम कि जिले में कितने बोरिंग हैं। एक-एक बोरिंग से हर साल हजारों गैलन पानी खींचा जाता है, मगर इस जल दोहन का कोई हिसाब नहीं रखा जाता। जनपद में 87 नहरें और छोटी माइनर हैं। नहरों से हो रही सिंचाई पर नजर दौड़ाए तो यहां भी पानी बेहिसाब खर्च किया जाता है। वहीं सरकार द्वारा मुफ्त सिंचाई के लिए पानी मुहैया कराने की योजना के बाद से तो खेतों में बेहिसाब पानी खर्च किया जा रहा है।
यह है पानी की उपलब्धता :
ब्लॉक 5 पानी की उपलब्धता (फुट में)
- अमरिया-13.50
- बिलसंडा-13.25
- पूरनपुर - 12.75
- ललौरीखेड़ा-12
- बरखेड़ा-11.50
- बीसलपुर-11
- मरौरी- 10
संरक्षण के उपाय अभी से करें वरना कल देर हो जाएगी
जनपद में भूगर्भ जल विकास की दर 78. 3 प्रतिशत है, जोकि मंडल में सबसे कम है। फिलहाल अभी कोई ब्लॉक डेंजर व अति दोहित श्रेणी में नहीं है। वर्ष 2001 में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1816 घनमीटर थी, जो 2011 में घटकर 1545 घन मीटर रह गई। देश की आबादी को देखते हुए पानी की आवश्यकता निरंतर बढ़ती जा रही है। पीने के पानी, सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बहुत कम होती जा रही है। इसके अलावा भूजल में हानिकारक तत्वों की अधिकता भी बढ़ती जा रही है। बोरान स्नायु तंत्र को, सोडियम के साथ क्लोराइड मिलकर उच्च रक्तचाप, कैल्शियम जोड़ों में कड़ापन, आर्सेनिक त्वचा रोग और कैंसर, लेड बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास में बाधा और आयरन आमाशय से संबंधी रोग की संभावना बढ़ा रहे हैं। कुल जल का 97 फीसदी समुद्रों में है। शेष तीन फीसदी सतही जल है तथा 21.6 प्रतिशत भूगर्भ जल है। सतही जल का मात्र तीन प्रतिशत हमें पेयजल के रूप में उपलब्ध है। स्पष्ट है कि पेयजल बहुत कम है। हमें जल संरक्षण के उपाय अभी से शुरू करें वरना कल बहुत देर हो जाएगी। - लक्ष्मीकांत शर्मा, विज्ञान संचारक, समन्वयक, समाधान विकास समिति विपनेट क्लब
पानी की उपलब्धता स्ट्रेटा चार्ट के जरिए पता की जाती है। जिले में पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। मात्र अमरिया ब्लॉक में पानी की उपलब्धता में मामूली कमी है। जल संरक्षण को लेकर जरूरी कदम उठाया जाना भविष्य के लिए जरूरी है। - पीके वर्मा, सहायक अभियंता, जल निगम
शहर में वाटर प्लांट और कार वाशिंग सेेंटरों से जल मूल्य वसूला जा रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों में सबमर्सिबल पंप से अवैध तरीके से जल दोहन करने वालों की जानकारी फिलहाल नहीं है। मामला संज्ञान में आया है। जानकारी कर पानी से कमाई और बर्बादी करने वालों को चिह्नित कर कार्रवाई की जाएगी। - सुरेंद्र प्रताप सिंह, अधिशासी अधिकारी नगरपालिका