यूपी में 1967 में हुए विधानसभा चुनाव के दो साल बाद ही सरकार भंग हो गई और 1969 में पुन: चुनाव कराए गए। दो साल के ही इस अंतराल में तीन विधायकों की पकड़ जनता से ढीली हो गई और बरखेड़ा के किशनलाल को छोड़कर तीनों में से कोई विधायक अपनी सीट नहीं बचा पाया। पीलीभीत में आईएनसी को प्रत्याशी बदलने पर जरूर कामयाबी मिली लेकिन बीसलपुर और पूरनपुर सीट पर पहली बार बीकेडी के दो प्रत्याशी तेजबहादुर गंगवार और हरनरायन ने जीत हासिल की। विधानसभा के लिए हुए पहले उपचुनाव में पीलीभीत सीट से छह प्रत्याशी मैदान में उतरे थे। विधायक बाबूराम के अलावा नफीस अहमद और धीरेंद्र सहाय पहले भी प्रत्याशी रहे थे, जबकि अली जहीर, मुन्नीलाल व हरीश चंद्र नए चेहरे थे। आईएनसी के अली जहीर ने बीजेएस के विधायक बाबूराम को हराकर जीत हासिल की। इससे पहले के चुनाव में आरआर सिंह प्रत्याशी थे जो तीसरे नंबर पर रहे थे। इस सीट पर पीएसपी के धीरेंद्र सहाय तीसरे स्थान पर रहे। बरखेड़ा में भी छह प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा, यहां बीजेएस के विधायक किशनलाल ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के दुर्गा प्रसाद को हराकर लगातार दूसरी बार जीत हासिल की। तीसरे नंबर पर बीकेडी इंदल प्रसाद रहे। शेष दोनों बीसलपुर व पूरनपुर विधानसभा सीटों पर बीकेडी (भारतीय क्रांतिदल) ने कब्जा जमाया। बीसलपुर सीट पर तीन बार विधायक रहे आईएनसी के मुनींद्र पाल सिंह को हराकर बीकेडी के तेज बहादुर गंगवार विजयी रहे थे। यहां तीसरे नंबर पर बीजेएस के श्रीधर रहे। सबसे बड़ी विधानसभा पूरनपुर से तीन प्रत्याशियों में मुकाबला हुआ। जिसमें बीकेडी के हरनरायन पहली बार विधायक बने। उन्होंने बीजेएस प्रत्याशी को 272 मतों के मामूली अंतर से परास्त किया था। वहीं आइएनसी विधायक मोहनलाल आचार्य तीसरे स्थान पर पहुंच गए थे।
बीजेएस और बीकेडी में रही टक्कर
1969 में चुनाव विधानसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ और भारतीय क्रांतिदल के बीच मुकाबला हुआ था। इसमें दो बीसलपुर व पूरनपुर में बीकेडी ने भले ही जीत दर्ज की लेकिन पूरनपुर सीट पर बीजेएस मात्र 272 मतों से पिछड़ गई थी, जबकि पीलीभीत में भी बीजेएस के बाबूराम दूसरे नंबर पर रहे थे। इस प्रकार बीजेएस चार सीटों में एक पर जीतने के साथ दो सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी।