टाइगर रिजर्व में गश्त के नाम पर अब कर्मचारी अधिकारी फर्जी रिपोर्टिंग नहीं कर सकेेंगे। कुछ दिनों पूर्व महोफ और माला रेंज में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू की गई जीपीएस सर्वे को अब शेष तीन रेंजों में भी प्रारंभ कराया जा रहा है।
जंगल में गश्त के नाम पर अक्सर वनकर्मी चौकी और कार्यालयों में बैठकर फर्जी रिपोर्टिंग करते थे। इससे जंगल की सही स्थिति की जानकारी नहीं हो पाती है। टाइगर रिजर्व बनने के बाद गश्त को वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ने के उद्देश्य से जीपीएस (ग्लोबल पोजिसनिंग सिस्टम) उपकरण दिए गए थे। प्रारंभ में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में केवल महोफ और माला रेंज में प्रारंभ कराया गया था। इसके लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने दोनों रेंजों को जीपीएस उपकरण उपलब्ध कराकर प्रशिक्षण दिया था। दोनों रेंजों में इसके सफल होने के बाद अब टाइगर रिजर्व की अन्य तीन रेंजों क्रमश: बराही, दियोरिया और हरीपुर में भी जीपीएस गश्त की तैयारी की जा रही है। इसके लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने टाइगर रिजर्व के अधिकारियों से संपर्क कर रेंजों मेें तैनात स्टाफ की जानकारी जुटा ली है। जल्द ही सभी को उपकरण उपलब्ध कराकर ट्रेनिंग कराई जाएगी।
कैसे होती है जीपीएस गश्त
गश्त के दौरान वनकर्मी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ से उपलब्ध कराए गए जीपीएस उपकरण लेकर चलते हैं साथ ही एक फार्म भी रहता है। गश्त के दौरान कोई वन्यजीव, उसके पदचिन्ह अथवा अन्य संबंधित वस्तु जैसे सींग, मल आदि मिलता है तो उसे जीपीएस की लोकेशन के हिसाब से दर्ज किया जाता है। वहीं जीपीएस में लगी चिप को जब कंप्यूटर में लोड किया जाता है तो गश्त के दौरान तय की गई दूरी और रास्तों को दर्शाता है। कंप्यूटर की रिपोर्ट और वनकर्मी से प्राप्त रिपोर्ट का मिलानकर गश्त की हकीकत भी परखी जा सकती है।