टाइगर रिजर्व बनने के बाद से जंगल में लगातार बढ़ रही बाघों की संख्या और उसके सापेक्ष कम चौड़ा जंगल जंगल के किनारे रह रहे लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनता जा रहा हैं। दरअसल परिवार बढ़ने के 18 माह बाद नर शावक अपनी मां से अलग होकर नया क्षेत्र बनाने का प्रयास करता है, लेकिन प्राकृतिक आवास मयस्सर न होने के चलते बाघ अक्सर जंगल से बाहर आ जाता है। जंगल से सटे गन्ने की फसल को बाघ अपना ठिकाना बना लेते है लेकिन जब फसल कटती है तो आवास छिनने के चलते बाघों के हमले बढ़ जाते है। पीलीभीत के 72 हजार हेक्टेअर में फैले जंगलों को टाइगर रिजर्व घोषित हुए करीब ढाई साल हो गया है। इस ढाई साल में बाघों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। पिछले दिनों हुई गणना के परिणाम अभी सामने नहीं आए हैं लेकिन से जुड़े लोगों के अनुसार संख्या 55 से ऊपर पहुंच सकती है। बाघों के जंगल से बाहर आने का यह प्रमुख कारणों को लेकर विशेषज्ञों की मानें तो पीलीभीत का जंगल घोड़े की नाल के आकार हैं जिसकी लंबाई तो काफी है लेकिन चौड़ाई दो किमी से लेकर 15 किमी तक है जबकि एक बाघ 20 किमी क्षेत्र में रहता है। वहीं दूसरी ओर बाघ का परिवार बढ़ने पर उसके नर शावक 18 माह बाद मां का साथ छोड़कर नया क्षेत्र बनाने निकल पड़ते हैं चूंकि जंगल की चौड़ाई कम है और इससे सटे खेतों में गन्ने की फसल बड़े पैमाने पर होती है ऐसे में बाघ गन्ने के इन खेतों को अपना प्राकृतिक वास बनाकर रहने लगते हैं। गन्ने के इन खेतों में इन्हें तृणभोजी वन्यजीव एवं इनके बच्चे भी पर्याप्त मात्रा में मिल जाते हैं। इसके चलते कुछ माह तक बाघ आराम से इन खेतों में छिपे रहते हैं लेकिन ठंड की शुरुआत के साथ गन्ने की कटाई शुरू होते ही बाघ इधर उधर निकले लगते हैं।जंगल में पर्याप्त हरे चारे की भी कमीतृणभोजी वन्यजीव बाघों का भोजन हैं लेकिन जंगल में चारागाह प्रबंधन ठीक न होने और जंगल किनारे क्षेत्र में खेतों में फसल के रूप में पर्याप्त मात्रा में चारा मिलने के कारण तृणभोजी जंगल से बाहर आते हैं। इनके पीछे भी बाघ बाहर जा जाते हैं।
फसल कटने पर होते हैं आक्रामक जंगल से निकले बाघ गन्ने में बास बनाते हैं लेकिन फसल कटते ही इन्हें अपना आशियाना उजड़ता दिखाई देता है जिसके चलते यह आक्रामक हो जाते हैं और गन्ने के खेत अथवा इसके आसपास मौजूद लोगों पर हमला कर देते हैं।
जंगल की चौड़ाई कम होने और संख्या लगातार बढ़ने के चलते बाघ जंगल से बाहर आ रहे हैं। चूंकि जंगल की सीमा 677 किमी हैं जिसपर एक साथ तार फेसिंग करना संभव नहीं है। जंगल से सटे क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाकर एवं गन्ने के स्थान पर अन्य फसलों पर प्रति लोगों को प्रेरित करना होगा।
विनोद कृष्ण सिंह, वनसंरक्षक, बरेली
कहीं और बाघ न बन जाएं नरभक्षी
माधोटांडा। टाइगर रिजर्व जंगल से सटे अर्जुनपुर से कीरतपुर व टांडा छत्रपति तक एक लंबे क्षेत्र में डेढ़ माह में बाघ घरों में घुस कर कई मवेशियों को अपना निवाला बना चुका है। वहीं वन महकमा मामले को इतने हल्के में लेकर चल रहा है कि जनता को गुमराह करने को महज हाथियों पर दो चार निहत्थों को बिठाकर कांबिंग कर रहा है। टाइगर रिजर्व के बराही जंगल से पहलेे भी एक बाघ निकला था। उस दौरान वन विभाग ढुल मुल रवैया अपनाए रहा जब कि जनता शोर मचाती रही। नतीजा यह निकला कि सात लोग बाघ का शिकार बन गए। उसके बाद वन विभाग ने उसे ट्रक्यूलाइज कर लखनऊ चिड़ियाघर भेजवाया। इधर उसके बाद डेढ़ माह से बराही के जंगल से एक और बाघ निकलकर सीमावर्ती लोगों के घरों में घुसकर मवेशियों को अपना शिकार बना रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि ऐसा ही रहा तो बाघ द्वारा फिर किसी बड़ी घटना को अंजाम दिया सकता है और यदि एक हमला भी किसी ऐसी जगह हो गया जहां उसे मानव का खून या मांस खाने का मौका मिल गया तो यह बाघ भी पकड़े गए बाघ की तरह खूंखार हो जाएगा। जिसे नरभक्षी बनने से फिर रोक पाना मुश्किल होगा। ऐसे में वन विभाग के अधिकारियों को बाघ की लगातार मैदानी क्षेत्र में मौजूदगी को गंभीरता से लेना होगा।