पीलीभीत। जिले के प्रमुख उत्पाद बांसुरी, कालीन, फर्नीचर और चावल को निर्यात में शामिल तो कर लिया है। लेकिन पर्याप्त संसाधन, सहूलियत और सहायता के अभाव में इनका कारोबार लगातार सिमट रहा है। इससे बांसुरी के सुर बेसुरे हो गए हैं, कालीन का कारोबार करने वाले महज कारीगरी तक सीमित हैं, फर्नीचर उद्योग विस्तार कर नहीं कर पाया है और चावल उत्पादक किसानों को अपनी फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिलता। अगर इन उत्पादों को सरकारी सहारा मिल जाए तो जिले से करीब 300 करोड़ सालना का निर्यात किया जा सकता है।
जिला उद्योग केंद्र की जिला प्रोत्साहन समिति के एलान के बाद इन चारों उत्पादों की मौजूदा स्थिति जानी तो उनकी असल समस्याएं सामने आईं। बांसुरी उद्योग को सिर्फ कागजों पर बढ़ावा दिया गया। निर्यात के साधन न होने से उद्योग ठंडा पड़ गया। करीब 20 कारखाने बंद हो गए। कारीगर 50 फीसदी तक कम हो गए।
कालीन का काम बीसलपुर क्षेत्र के कुछ गांवों में होता है। बुनकरों की स्थिति भी काफी दयनीय है। करीब 80 करोड़ की कालीन बनाने वाले बुनकर सिर्फ दिहाड़ी मजदूर बनकर रह गए। यही हाल किसानों का है। जिले में सिर्फ दो कारोबारी ही चावल निर्यात करते हैं। किसानों को अपनी फसलों का पूरा मूल्य नहीं मिल पाता।
चारों उत्पादों का जिले में कारोबार
- चावल : पिछली सीजन में 83 करोड़ का चावल विदेशों में निर्यात किया गया। चार लाख से ज्यादा किसान खेती करते हैं।
- बांसुरी : सालाना कारोबार दस करोड़ से ऊपर का है। करीब एक हजार कारीगर जुड़े हैं।
- कालीन : करीब तीन हजार कारीगर हर साल दो करोड़ का काम करते हैं। उनके द्वारा तैयार कालीन 80 करोड़ से ऊपर बैठती है।
- फर्नीचर : जिले में छोटे बड़े एक हजार फर्नीचर के कारखाने हैं। तीन हजार से ज्यादा लोग इससे जुड़े हैं। हर साल 50 करोड़ से ऊपर का कारोबार।
अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी तक जाती थी बांसुरी
मोहल्ला शेर मोहम्मद निवासी अरमान नबी बांसुरी कारोबारी हैं। उनके परिवार में बांसुरी का काम तीन पीढ़ियों से होता आ रहा है। अब वह पुश्तैनी काम आगे बढ़ा रहे हैं। अरमान बताते हैं कि उनके दादा और पिता के समय उनके कारखाने में बनी बांसुरी अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस तक जाती थी, लेकिन पिछले पांच साल से कारोबार ठंडा हो गया। उनके कारखाने से हर महीने दो से ढाई लाख बांसुरी बाहर भेजी जाती थी जो अब महज 15 से 20 हजार तक रह गई है। कारीगरों की संख्या भी घटकर आधी रह गई। उनका कहना है कि सरकार निर्यात के लिए सुविधाएं बढ़ाए तो बांसुरी का कारोबार फिर खड़ा हो सकता है।
फर्नीचर उद्योग भी लखनऊ और दिल्ली तक सिमटा
शहर में फर्नीचर के दस बड़े कारोबारी हैं। अच्छी कारीगरी होने के बावजूद जिले का फर्नीचर लखनऊ और दिल्ली तक ही पहुंच पाता। फर्नीचर कारोबारी मोहम्मद अनवर बताते हैं कि फर्नीचर बाहर भेजने के पर्याप्त साधन नहीं हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा पड़ता है। ट्रेन की सुविधा नहीं। इस वजह से जिले का फर्नीचर उद्योग आगे नहीं बढ़ पा रहा।
गांवों तक सिमटा कालीन बनाने का काम
बीसलपुर तहसील के पहाड़गंज और मीरपुर बहानपुर गांव में कालीन बनाने का काम होता है। करीब तीन हजार लोग इस कारोबार से जुड़े हैं। ये बुनकर सिर्फ मजदूरी तक सिमटे हैं। पानीपत, दिल्ली जैसे शहरों के बड़े कालीन कारोबारी उनसे मजदूरी पर कालीन तैयार कराते हैं। करीब सालाना दो करोड़ रुपये मजदूरी कारीगरों को मिलती है। अगर इन्हें पर्याप्त साधन और सुविधाएं मिलें तो वह खुद कालीन का कारोबार जिले में खड़ा कर सकते हैं। बुनकरों का कहना है कि तीन हजार कारीगर सालाना करीब 80 करोड़ से ऊपर की कालीन तैयार करते हैं। फायदा बाहर के कारोबारी को मिलता है। कालीन कारीगर मोहम्मद आकिल, इसलाम, अली बताते हैं कि ऑर्डर पर वह कालीन तैयार करते हैं। बड़े कारोबारी कच्चा माल भी उपलब्ध कराते हैं। अगर उन्हें सुविधाएं मिलें तो वह खुद के कारखाने लगाकर बड़ी मात्रा में कालीन तैयार करा सकते हैं। पूंजी न होने के कारण वह सिर्फ दिहाड़ी पर कार्य करते हैं।
यातायात की सुविधाएं बढ़ाने की दरकार
इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन (आईआईए) के जिला संयोजक साकेत अग्रवाल का कहना है कि प्रशासन और जिला उद्योग केंद्र ने निर्यात में बांसुरी के साथ तीन अन्य उत्पादों बढ़ाकर अच्छी पहल की है, लेकिन जिले में पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। यातायात की सुविधाएं बढ़ाई जाए। कारीगरों को उच्च गुणवत्ता का प्रशिक्षण दिया जाए। वित्तीय सहायता प्रदान की जाए। जिले में लंबे समय से बांसुरी का काम होता है, लेकिन अब बांसुरी उद्योग दम तोड़ रहा है। उन्होंने बताया कि आईआईए की तरफ से जल्द प्रशिक्षण कार्यक्रम किए जाएंगे।
ये हैं दुश्वारियां
- ट्रांसपोर्ट की अच्छी सुविधा नहीं।
- वित्तीय सहायता नहीं मिलती।
- कारीगरों के लिए प्रशिक्षण की सुविधा नहीं।
- सरकारी योजनाओं का लाभ सभी को नहीं मिल पाता।
- पूंजी की कमी, कुशल कारीगर होने के बावजूूद दिहाड़ी पर काम करना पड़ता है।
- निर्यात के लिए सहायता नहीं मिलती।
गांव पहाड़गंज में कालीन बनाता बुनकर। संवाद- फोटो : PILIBHIT