टाइगर रिजर्व से सटे इलाकों में बाघ के हमले ग्रामीणों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। हमलों के बाद भी वन महकमा दावे तो बड़े-बड़े करता रहा, लेकिन अभी तक अमल एक पर भी नहीं हुुआ है। न तो तार फेसिंग कराई गई और न ही हाथी मिले। इतना ही नहीं स्टॉफ के अभाव में तैनात किए दैनिक वाचरों को मानदेय तक नहीं मिल रहा। हालात ऐसे ही रहे तो वन क्षेत्र के पास रहने वालों के लिए बाघ का खतरा कम होने की जगह बढ़ता जाएगा। नौ जून 2014 को पीलीभीत के जंगलों को टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। उम्मीद की गई थी कि बाघों की सुरक्षा के साथ-साथ जंगल के आसपास क्षेत्र के लोगों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे साथ ही व्यवस्थाओं में भी बदलाव होगा। लेकिन तीन साल पूरे होने के बाद हालात सुधरने की जगह बिगड़ते जा रहे हैं। संरक्षण से बाघों की संख्या तो बढ़ रही है, जिसके चलते बाघ जंगल से बाहर आकर आम जनता पर हमलावर हो रहे हैं। वहीं दूसरी ओर वनाधिकारी हर घटना के बाद व्यवस्थाओं को और बेहतर करने, सुरक्षा के लिए तार फेसिंग आदि की घोषणाएं करते हैं जो कुछ दिनों बाद हवाई साबित हो जाती हैं। जनता को बार-बार मिले आश्वासन के बाद भी व्यवस्थाएं ठीक न होने और हमले की घटनाओं में बढ़ोत्तरी होने से ही लोगों में आक्रोश बढ़ा रहा है, जिसका परिणाम पिछले दिनों वनकर्मियों के साथ मारपीट के रूप में सामने भी आ चुका है। टाइगर रिजर्व से सटे क्षेत्र के ग्रामीणों की हमदर्दी बटोरने को एक दो स्वास्थ्य कैंप या गैस चूल्हा आदि बांटकर विभाग अपनी पीठ ठोंक लेता है लेकिन इससे जनता का भला होने वाला नहीं। सुरक्षा उपाय को लेकर ठोस रणनीति न बनने से क्षेत्रवासियों में दहशत है और उनमें नाराजगी बढ़ती जा रही है।