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सरकारी जमीनों पर बसे बंगाल से आए किसानों को मिलेगा न्याय

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पीलीभीत। प्रदेश सरकार आजादी के बाद बाहर आकर जनपद में सरकारी जमीनों और शारदा सागर डैम की तलहटी में आवास बनाकर रहने और खेती करने वालों को पुर्नवासित करने की योजना बना रही है। अपर मुख्य सचिव राजस्व रेणुका कुमार ने कमिश्रर की अध्यक्षता में समिति को गठित करते हुए तीन महीने के भीतर तय बिंदुओं पर विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। यदि सब कुछ ठीकठाक रहा तो जनपद के बरसों से खानाबदोशी जीवन जीने को मजबूर 3000 से अधिक परिवारों को जल्द ही न्याय मिलने उम्मीद है।
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जनपद में वर्ष 165 से लेकर 1971 तक बांग्लादेश और पूर्वी पाकिस्तान से तमाम विस्थापित परिवार यहां आकर बसे थे। उस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश के बाद तराई इलाके के आधा दर्जन से अधिक गांवों में बसाया गया था। यह अधिकांश परिवार शारदा डैम की तलहटी के किनारे ही बस गए थे। शुरूआत में नौजल्हा नंबर एक में लगभग 82 परिवार, नौजल्हा नंबर दो में 80, गभिया सहराई में 165, ढकिया तालुके महाराजपुर में 65, रमनगरा में लगभग 80 विस्थापित परिवार आकर बसे थे। यहां पर विस्थापितों के आने का सिलसिला इसके बाद भी चलता रहा।
1989 में आई बाढ़ के बाद वन भूमि में हो गई दर्ज
तत्कालीन केंद्र सरकार के आदेश पर जिला पुर्नवासन विभाग ने इन विस्थापित परिवारों को पांच-पांच एकड़ कृषि भूमि और एक-एक आवास दिया गया था। वर्ष 1989 में शारदा में आई बाढ़ से ढकिया ताल्लुके महाराजपुर और रमनगरा क्षेत्र नदी में समां गया था। इनकी जमीनें भी नदी निगल गई। जब कुछ वर्षों के बाद नदी ने उस जमीन को छोड़ दिया तो कुछ विस्थापित परिवार तो वहां पुन: काबिज हो गए, जबकि कुछ परिवार शारदा सागर डैम के सामने तलहटी में अस्थायी तौर पर यह कहकर बसा दिए गए कि उन्हें बाद में कहीं अन्यत्र बसाया जाएगा। यह सभी शारदा डैम के सामने वर्जित क्षेत्र में बसी कॉलोनियों में आज भी रह रहे हैं। इसी बीच वर्ष 1999 में समूची विस्थापित परिवारों को एलाट की गई ( गभिया सहराई को छोड़) सभी गांवों की जमीन राजस्व अभिलेखों में वन भूमि दर्ज कर दी गई। हालांकि आज भी यहां आबादी बसी हुई है और यह विस्थापित परिवार आज भी अपनी जमीन पर मालिकाना हक दिलाने की मांग करते आ रहे हैं।
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कमिश्नर की अध्यक्षता में गठित समिति करेगी निदान
शासन इन विस्थापित परिवारों की समस्याओं के समाधान को कमिश्नर की अध्यक्षता में कमेटी गठित की है। इस समिति में मुख्य वन संरक्षक, डीएफओ, सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता और अधिशासी अभियंता, उप गन्ना आयुक्त, जिला गन्ना अधिकारी, बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी को बतौर सदस्य शामिल किया गया है। डीएम द्वारा नमित एडीएम समिति के सदस्य सचिव होंगे। गठित समिति को तीन माह के भीतर निर्धारित बिंदुओं पर जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं।
अभी शासनादेश प्राप्त नहीं हुआ है। शासनादेश प्राप्त होने पर इस मामले में कार्रवाई की जाएगी। - वैभव श्रीवास्तव, डीएम
इन बिंदुओं पर होगी जांच
- ऐसे परिवारों की स्थिति तथा भूमि का रकबा जिस पर उनका कब्जा बताया जा रहा है।
- उस समय व वर्तमान अभिलेखों के अनुसार भूमि की स्थिति।
- समिति द्वारा वन विभाग, सिंचाई विभाग तथा राजस्व विभाग से संबंधित विभिन्न विधिक प्रावधानों के तहत वन विभाग, सिंचाई विभाग व अन्य सुसंगत विभागों के अभिलेखों, राजस्व विभाग के मूल बंदोबस्त से लेकर अद्यतन राजस्व अभिलेखों का गहन परीक्षण कर संबंधित क्षेत्रों का भौतिक सत्यापन व सर्वे।
- समिति द्वारा इस तथ्य का भी परीक्षण किया जाएगा कि जिन भूखंडों को वन विभाग का बताया जा रहा है उन, भूखंडों के संबंध में वन अधिनियम 1927 की धारा-4 कब जारी की गई है?
- यह भी स्पष्ट पता किया जाएगा कि धारा-20 की अधिसूचना जारी करने के पूर्व प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया गया था या नहीं?
- यह भी स्पष्ट किया जाए कि जब कथित रूप से किसान भूमि पर खेती कर रहे थे, तो वह भूमि वन भूमि के रूप में कैसे दर्जं हो गई?
- समिति बताएगी कि वर्षं 1947 से कब्जा होने पर 15 वर्षं लगातार खेती करने के बावजूद किसानों की जो भूमि वन भूमि के रूप में दर्जं कर दी गई थी, क्या इसे पुन: वापस किया जा सकता है?
- समिति यह भी स्पष्ट करेगी कि संबंधित प्रकरण में अतिक्रमण यदि 1980 के पूर्व का है तो क्या एफसी एक्ट में रेगुलराइजेशन आफ ओल्ड एंक्रोचमेंट की दी गई व्यवस्था के अनुसार कार्रवाई कर किसानों को राहत दी जा सकती है?
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- समिति यह भी बताएगी कि उसके विचार में किसानों की समस्याओं के समाधान का क्या रोडमैप होना चाहिए। इस संबंध में स्पष्ट संस्तुति देगी।
- समिति भूमि का सत्यापन व पैमाइश प्रभावित पक्ष की उपस्थिति में कराएगी और इसके लिए उनके हस्ताक्षर भी प्राप्त करेगी।
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