पीलीभीत। पांच सौ वर्षों के अथक संघर्ष के बाद अयोध्या में पांच अगस्त को पीएम मोदी भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण का शिलान्यास करेंगे। राम मंदिर के लिए वर्ष 1528 से 1992 तक न जाने कितने संघर्ष हुए। कितने रामभक्त वीरगति को प्राप्त हो गए। तीन दशक पहले अयोध्या से जिस राम मंदिर आंदोलन की शुरूआत हुई तो वह तराई में भी तेजी से फैला था। श्री राम नाम का शिलापट्ट लेकर पदयात्राएं निकाली गई थीं। इस आंदोलन में पीलीभीत से 1176 राम भक्त जेल गए थे। इनमें से कई बाद में सांसद और विधायक भी बने। अब इनमें से तमाम रामभक्त गोलोकवासी (दिवंगत) हो चुके हैं। अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण उन्हीं के प्रयासों का प्रतिफल है।
मुलायम सरकार में 1990 के वक्त राम मंदिर आंदोलन चरम पर था। पुलिस सड़क या चौराहे पर जय श्रीराम कहने वाले रामभक्तों को लाठी चार्ज करके जेल भेज देती थी। अयोध्या में जब राम मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा का एलान किया गया तो उसकी आंदोलन की चिंगारी पीलीभीत तक भी पहुंची। राम नाम की ज्योति घूमी थी। मंदिरों और घरों में अखंड दीप जले। यहां से हजारों राम भक्तों ने अयोध्या कूच का एलान कर दिया। पुलिस ने आंदोलन के अगुवा प्रमुख नेताओं की ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां शुरू कर दीं। पीलीभीत से 1176 राम भक्तों को गिरफ्तार कर बरेली और बदायूं की जेलों में ठूंस दिया गया।
आरएसएस को मिला था आंदोलन से जोड़ने का दायित्व
आरएसएस के तत्कालीन जिला प्रचारक दुर्गा प्रसाद को हिंदू समाज को आंदोलन से जोड़ने की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने अपना नाम और वेषभूषा बदल दिया और अयोध्या कूच मिशन पर परदे के पीछे काम करने लगे। संघ प्रचारक आमतौर पर कुर्ता पजामा या खाकी पहनते हैं, मगर उच्च पदाधिकारियों की ओर से उन्हें पतलून शर्ट पहनने और अपना नाम बदलकर मुकेश कुमार करने की सलाह दी गई। भाजपा का संगठन उस समय बेहद कमजोर था। तब तत्कालीन बरखेड़ा ब्लॉक प्रमुख डॉ. परशुराम गंगवार ने राम मंदिर आंदोलन की कमान संभाली। वह बाबा जय गुरुदेव की दूरदर्शी पार्टी छोड़कर आंदोलन में शामिल हुए। डॉ. परशुराम गंगवार ने राम मंदिर आंदोलन के समर्थन में गांव-गांव जाकर सभाएं कीं। उसके बाद वह भाजपा में शामिल हुए और राम लहर में सांसद बने। उनके अलावा अन्य प्रमुख आंदोलनकारियों में रामसरन वर्मा (वर्तमान बीसलपुर विधायक), वीके गुप्ता (बाद में शहर से विधायक बने) किशनलाल (बरखेड़ा से विधायक बने) ब्रजस्वरूप् मिश्रा, वीर सिंह, प्रमोद प्रधान (बाद में पूरनपुर विधायक बने) मास्टर गोपीकृष्ण सक्सेना, वीरेंद्र अग्रवाल, रामानंद सिंह मझोला, रमेश गुप्ता, पंडित देवेंद्र स्वरूप मिश्रा, डॉ. मनोहर शर्मा और धीरेंद्र मिश्र भी पुलिस की लाठी खाकर जेल गए। बाद में इनमें कई आंदोलनकारी भाजपा के मजबूत स्तंभ बनकर उभरे। कोई चुनाव लड़कर सांसद या विधायक बना तो कोई भाजपा संगठन में चमका। आंदोलनकारियों का बस एक ही सपना था कि अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बने। अब जब लंबे संघर्ष के बाद अयोध्या में पांच अगस्त को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर निर्माण प्रारंभ होने जा रहा है, तब इनमें से तमाम आंदोलनकारी गोलोकवासी हो चुके हैं। भले ही वह मंदिर निर्माण अपनी आंखों से नहीं देख पाए, मगर अपने त्याग और बलिदान से राम मंदिर निर्माण का सपना साकार कर गए।
सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे
वर्ष 1990 के राम मंदिर आंदोलन में राम भक्त सुबह भोर में ही भगवान राम मंदिर निर्माण के लिए शहर और कस्बों में प्रभातफेरियां निकालते थे। उसमें यह नारा लगता था-लाठी गोली खाएंगे, सौगंध राम की खाते हैं हम मंदिर वहीं बनाएंगे...। घर-घर भगवा छाएगा, रामराज्य फिर आएगा...जैसे नारे लगते थे तो रामभक्तों में अलग ही जोश देखने को मिलता था।
बजरंग दल नेता विनय कटियार भी आए
तीन दशक पहले राम मंदिर आंदोलन की कमान विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस और बजरंग दल ने संभाली थी। आंदोलन को गति देने के लिए तत्कालीन बजरंग दल नेता विनय कटियार भी पीलीभीत आए और उनकी उस समय शहर और गांवों में कई सभाएं हुईं। शिलापूजन कार्यक्रम चला।