पीलीभीत। पितृ पक्ष में परंपरा के मुताबिक घरों में अपने पितरों के तर्पण के लिए श्राद्ध, पूजा और दान जैसे कई अनुष्ठान अगले 15 दिन तक चलेंगे, मगर कई ऐसे परिवार भी है जो अपनों के परलोक गमन के बाद उन्हें भूल गए और उनके फूल यानी अस्थियों को विसर्जित करने तक की फुरसत नहीं निकाल पाए। शहर के मुक्तिधाम में करीब 350 से अधिक अस्थि कलश लंबे समय से ऐसे भगीरथ के इंतजार में हैं जो उन्हें विसर्जित कर मोक्ष दिला सके।
मान्यता है कि मृत्यु के बाद अस्थियों को गंगा में विसर्जन होने के बाद ही आत्मा को मुक्ति मिलती है। अस्थियां विसर्जित न होने तक आत्मा भटकती रहती है। यदि पितरों के श्राद्ध परपंरा में वाकई सच्चाई है तो सैकड़ों पितरों की आत्मा तड़प रही होगी। वजह यह है कि उनके परिजन उनकी अस्थियां (फूल) चुनकर गंगा में प्रवाहित करने के बजाए श्मशान की एक बंद कोठरी में रखकर छोड़ गए हैं। शहर के मुक्तिधाम की एक कोठरी में सैकड़ों कलशों में चिताओं से चुने गए फूल इस इंतजार में रखे हैं कि शायद कभी कोई अपना उन्हें सिराने आएगा। शहर के कई परिवार अपनी व्यस्त दिनचर्या में इन फूलों को गंगा में विर्सजित करने का समय नहीं निकाल पा रहे हैं। नतीजा यह है कि धीरे-धीरे इन अस्थि कलशों की संख्या बढ़ती जा रही है। संख्या इतनी अधिक हो चुकी है कि अब अस्थि कलशों को व्यवस्थित रखना ही मुश्किल हो रहा है। मुक्तिधाम की देखरेख करने वाले भगवानदास ने बताया कि मुक्तिधाम समिति ने इन परिवारों को कई बार फोन कॉल कर अपने परिजनों की अस्थि विसर्जन करने को कहा है, मगर किसी के पास अपने पितरों के लिए वक्त ही नहीं है। कुछ अस्थि कलश को अपनों का इंतजार करते टूट भी गए। अब जिसको भी फोन करो तो कोई दो माह तो कोई छह माह बाद अस्थि कलश ले जाने की बात कह रहा है। कुछ अस्थि कलश तीन से चार साल पुराने रखे हुए हैं। इनकी संख्या करीब 350 से अधिक हो चुकी है। इधर अब मुक्ति धाम समिति ने एक बार फिर इन अस्थि कलशों को संबंधित परिजनों से ले जाने आग्रह किया है, ताकि उनके पितरों को उचित सम्मान मिल सके।