आकृति एजूकेशनल वेलफेयर सोसायटी, विश्व हिंदी मंच व उपाधि महाविद्यालय के तत्वावधान में चल रहे अंतर्राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी का रविवार को समापन हो गया। समापन पर विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली जिले की विभूतियों को पीलीभीत रत्न से सम्मानित किया गया।
शहर के उपाधि कॉलेज के समीप एक बैंक्वेट हाल में चल रहे कार्यक्रम में प्रथम सत्र के तहत वर्तमान बाल्य परिवेश और बाल साहित्य विषय पर परिचर्चा हुई, जिसमें हल्द्वानी की प्रो. प्रभा पंत, मिजोरम के प्रो. सुशील कुमार शर्मा, इंदौर की डॉ. शोभना जोशी व डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव, ईटानगर के हरीश शर्मा व बाला घाट से आए डॉ. गोविंद सिरसाटे ने वर्तमान बाल साहित्य पर प्रकाश डाला। अध्यक्षता दिल्ली से आए डॉ. दिविक रमेश ने की। द्वितीय सत्र में बाल साहित्य के प्रति जन उदासीनता के कारण व सुझाव विषय पर डॉ. देशबंधु, डॉ. रावेंद्र कुमार रवि, डॉ. अवधेश कुमार शुक्ला आदि बाल साहित्य को समृद्धिशाली बनाने का आह्वान किया।
इस दौरान उपाधि महाविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विनय गर्ग ने आयोजन की सराहना कर इसे प्रति वर्ष आयोजित कराए जाने की बात कही। अंतिम सत्र में हुए सम्मान समारोह में बाल साहित्यकार डॉ. भैरूलाल गर्ग, उदय किरौला, डॉ. नागेश पांडेय संजय, डॉ. रावेंद्र रवि, डॉ. विनय मालवीय, धन सिंह मेहता अंजान को आकृति बाल साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। संचालन डॉ. प्रणव शास्त्री व डॉ. अमित कुमार ने किया।
इस मौके पर डॉ. प्रणीता शास्त्री, पवन अग्रवाल, पीएस खरे, डॉ. जितेंद्र मिश्रा, विभव सक्सेना, जितेंद्र चौधरी, अल्पना सक्सेना, वर्षा सक्ेसना, दीपक मौर्य, विमल राठौर, डॉ. राखी मिश्रा, डॉ. रुचि चंद्रा आदि मौजूद रहे।
नौ विभूतियां पीलीभीत रत्न से अलंकृत
अमृतलाल (समाज सेवा), डॉ. महेश चंद्रा, डॉ. आरएच गोखले व डॉ. रोहित सिंह (चिकित्सा), डॉ. सुनीता सक्सेना, लक्ष्मीकांत शर्मा व शिक्षक बादशाह (शिक्षक), अविनाश मिश्रा (साहित्य), जावेद (नृत्य प्रशिक्षक)।
पाठ्यक्रम में शामिल हो बाल साहित्य
बाल साहित्य को प्रमुख स्थान न केवल साहित्य में अपितु पाठ्यक्रम में भी वांछित महत्व प्रदान किया जाना चाहिए। इससे युवा पीढ़ी संस्कारवान तो बनेंगे ही, साथ ही संस्कार भी एक से दूसरी पीढ़ी में समाहित होंगे।
डॉ. विकास दबे, प्रबंध संपादक देवपुत्र, इंदौर
बाल साहित्य के प्रसार की जरूरत
बाल साहित्य के प्रसार के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है। शिक्षकों की इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। आज के बच्चों को बाल साहित्य नहीं दिया गया तो वह कल प्रौढ़ साहित्य भी नहीं पढ़ सकेंगे।
डॉ. नागेश पांडेय, संजय बाल साहित्यकार, शाहजहांपुर