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पीलीभीत का बांसुरी उद्योग: 250 से ज्यादा परिवार कर रहे बांसुरी बनाने का काम, ऑर्डर न मिलने से मायूस

Thu, 31 Aug 2023 04:48 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत

सार

बांसुरी उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना काल में लगे लॉकडाउन के बाद बाहर से कच्चा माल मंगाने पर हो रहा खर्च निकालना दूभर हो रहा है। इधर, बांसुरी के ऑर्डर भी नहीं मिल पा रहे हैं। 
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बांसुरी उद्योग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पीलीभीत जिले की पहचान बांसुरी उद्योग कोरोना काल में लगे लॉकडाउन के बाद से अब तक उबर नहीं पाया है। इस धंधे में लगे शहर के करीब ढाई सौ परिवारों के सामने दूसरा व्यवसाय शुरू करना भी बड़ी चुनौती है। 

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कच्चा माल मंगवाने के बाद बाहर से बांसुरी का अपेक्षित ऑर्डर न मिलने से कारीगर खाली हैं। यदि शासन स्तर से इस उद्योग को बढ़ावा देने के प्रयास हों तो यहां की बांसुरी फिर से देश-विदेश में धूम मचा सकती है। सबसे बड़ी जरूरत तो कच्चा माल यहीं तैयार करने की है। अगर जिले में ही बांसुरी का बांस उगाने का सपना साकार हो जाए तो यहां खेतों में बांसुरी की धुन सुनाई दे सकती है।

ओडीओपी में शामिल है बांसुरी उद्योग 

प्रदेश सरकार ने पीलीभीत के बांसुरी उद्योग को एक जिला-एक उत्पाद की श्रेणी में शामिल किया है। यहां 250 से ज्यादा परिवार बांसुरी बनाने का काम करते हैं। यह उद्योग पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार 200 साल से चला आ रहा है। मौजूदा समय में जिले में इस उद्योग से जुड़े लोग अब दूसरा धंधा शुरू करने की योजना बना रहे हैं। 

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कारण है कि सरकार की ओर से एक जिला-एक उत्पाद में शामिल इस उद्योग को आशातीत लाभ नहीं मिल पा रहा है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना काल में लगे लॉकडाउन के बाद बाहर से कच्चा माल मंगाने पर हो रहा खर्च निकालना दूभर हो रहा है। इधर, बांसुरी के ऑर्डर भी नहीं मिल पा रहे हैं। कच्चा माल खराब हो रहा है। 

जन्माष्टमी के लिए मथुरा से अब तक नहीं आई डिमांड 

जन्माष्टमी पर्व को लेकर हर साल मथुरा से बांसुरी का बड़ा ऑर्डर मिलता था, लेकिन इस बार वहां बाढ़ के कारण अब तक ऑर्डर नहीं मिला है। मथुरा में आने वाले विदेशी पर्यटक बांसुरी को प्रसाद के तौर पर खरीद कर ले जाते हैं। लोकल में भी बिक्री ठीक नहीं हो रही है। स्थानीय स्तर से भी मांग नहीं आ गई है।

बांसुरी उद्योग से जुड़ीं मोहल्ला बसीर खां की रहने वाली हिना ने बताया कि मौजूदा समय में बांसुरी को लेकर अभी कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बन सकी है। मांग भी काफी कम हो गई है। शहर में करीब तीन दशक पहले दो हजार परिवार इस काम में लगे थे। अब मात्र दो-तीन सौ परिवार ही रह गए हैं। 
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