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जांच में फंसे पांच लोकतंत्र सेनानियों को नोटिस 

Fri, 24 Mar 2017 10:20 PM IST
ब्यूरो /पीलीभीत
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 जिले में कुछ संगीन अपराधों में लिप्त समेत कई लोगों को तत्कालीन प्रशासन की संस्तुति पर गलत ढंग से लोकतंत्र सेनानी घोषित किए जाने का मामला उजागर होने और सत्ता परिवर्तन के बाद भी प्रशासन गलत लोकतंत्र सेनानियों पर मेहरबान नजर आ रहा है। डीएम द्वारा इस गंभीर मुद्दे की करीब दस दिन पहले पत्रावली तलब किए जाने के बाद भी एडीएम ने वह पत्रावली डीएम को नहीं भेजी है। एडीएम ने शुक्रवार को इतना जरूर कहा कि पुलिस और एलआईयू की जांच में फिलहाल पांच लोग ऐसे पाए गए हैं जो प्रथम दृष्ट्या गलत ढंग से लोकतंत्र सेनानी बन गए प्रतीत हो रहे हैं। इसलिए उन्हें नोटिस जारी कर उनसे अपने लोकतंत्र सेनानी होने का प्रमाण देने को कहा गया है। जिले में आधा दर्जन से अधिक लोग गलत ढंग से लोकतंत्र सेनानी बना दिए गए हैं। शुरू में इस आवाज को असल लोकतंत्र सेनानियों ने भी समय-समय पर उठाया, लेकिन इनमें से अधिकांश के सपा नेताओं के करीबी होने के कारण प्रशासन उनकी बातों को नजरंदाज करता रहा। अमर उजाला ने इस मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किया तो आनन-फानन में प्रशासन ने जांच शुरू की। इसी कड़ी में प्रशासन ने जिले के खुफिया विभाग के अधिकारियों से भी एक रिपोर्ट मंगाई। जिसके आधार पर लोकतंत्र सेनानी के रूप में पेंशन प्राप्त कर रहे सलाउद्दीन पुत्र मोहम्मद फारूक, मोहम्मद अब्दुल वली खां, अखिलेश मिश्र, कौशल कुमार, और चंद्रप्रकाश प्रारंभिक जांच में अपात्र पाए गए। इनमें से सलाउद्दीन का कुछ दिन पहले निधन हो गया है। एसपी कार्यालय के माध्यम से खुफिया विभाग ने यह रिपोर्ट पिछले महीने ही एडीएम अजयकांत सैनी को भेज दी थी। तब सूबे में सपा की सरकार थी और जांच में फंसे अधिकांश लोकतंत्र सेनानी तत्कालीन सत्तापक्ष के नेताओं के करीबी थे। इस गंभीर मुद्दे पर भी प्रशासन ने वह तेजी नहीं दिखाई जो सरकारी धन का दुरुपयोग रोकने को दिखानी चाहिए। अमर उजाला के पूछने पर हालांकि एडीएम अपने बयान में यह जरूर कहा कि जांच में फंसे आरोपियों की पेंशन रोक दी गई है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। डीएम मासूम अली सरवर ने भी इसे गंभीर मामला बताते हुए एडीएम से पत्रावली तलब करने की बात कही थी, लेकिन अब जब डीएम से बात की गई तो उन्होंने साफ तौर पर यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि एडीएम के पास से पत्रावली उनके पास आई ही नहीं है। शुक्रवार को जब एडीएम से इस मामले में प्रगति जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने स्पष्ट किया कि एलआईयू और पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक उपरोक्त पांचों लोकतंत्र सेनानी प्रथम दृष्ट्या गलत लग रहे हैं। एलआईयू और पुलिस के पास ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिल पाया है जिसके आधार पर उन्हें लोकतंत्र सेनानी घोषित किया जा सके। ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि फिर उन्हें तत्कालीन प्रशासन ने कैसे लोकतंत्र सेनानी घोषित कर दिया? एडीएम इसके जवाब में तो फिलहाल कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके, लेकिन इतना जरूर कहा कि खुफिया रिपोर्ट में प्रथम दृष्ट्या संदिग्ध पाए गए पांच लोकतंत्र सेनानियों को नोटिस जारी करते हुए उनसे उनके लोकतंत्र सेनानी होने के सबूत मांगे गए हैं।
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...तो आरोपियों को बचा रहा प्रशासन
खुफिया रिपोर्ट के आधार पर प्रारंभिक जांच में पांच लोकतंत्र सेनानियों के संदिग्ध पाए जाने के मामले में प्रशासन सत्ता परिवर्तन के बाद भी आरोपियों को बचाने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। 15 हजार रुपये प्रतिमाह इन लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन जा रही है। प्रशासन अब नोटिस भेजने की बात कह रहा है। अगर प्रथम दृष्ट्या मामला गलत लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन देने का लग रहा है तो अब तक उनकी पेंशन क्यों नहीं रोकी गई? इन गलत लोकतंत्र सेनानियों को प्रशासन कहीं इस लिए तो नहीं बचा रहा क्योंकि जांच हुई तो तत्कालीन कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी फंस सकते हैं? आदि कई ऐसे सवाल हैं जिसका उत्तर प्रशासन के पास नहीं है।
जिले में पांच नहीं 15 से भी अधिक लोग ऐसे हैं जो गलत लोकतंत्र सेनानी हैं। प्रशासन अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए उन्हें बचाने की कोशिश कर रहा है। 25 मार्च को लोकतंत्र सेनानियों की बैठक बुलाई गई है। उसमे जो निर्णय होगा उसके तहत आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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अशोक शम्शा, अध्यक्ष जिला लोकतंत्र सेनानी
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