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सुनाई आपबीतीः खारकीव में इमारतें खंडहर हुईं... हर तरफ मौत का मंजर

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अपने परिवार के साथ यूक्रेन से लौटा मोहम्मद सैफ। (सोशल मीडिया) - फोटो : PILIBHIT
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पीलीभीत। युद्धग्रस्त यूक्रेन से शनिवार को लौटे पूरनपूर के हैदर और अमरिया के मोहम्मद सैफ ने वहां का हाल बताया। बताया कि खारकीव पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। इमारतें खंडहर हो चुकी हैं। हर तरफ मौत का मंजर है। वहीं अपने बच्चों को सकुशल देख माता पिता की आंखों में आंसू आ गए। एयरपोर्ट से जैसे ही बाहर निकले तो मां ने गले लगा लिया।
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सरैनी तिरकुनिया अमरिया निवासी मोहम्मद सैफ एक मार्च को खारकीव से निकलकर रोमानिया पहुंचे थे। वह बताते हैं कि मुश्किलों को सामना करते हुए ट्रेन मिली, जिसके जरिये वह रोमानिया पहुंचे। रोमानिया से चार मार्च को उनको फ्लाइट मिली और शनिवार को वह दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे। वह बताते हैं कि खारकीव की रूसी मिसाइलों ने इमारतें बर्बाद कर दी हैं। खौफ का मंजर है, हर तरफ बस तबाही दिख रही थी। उन्होंने खुदा का शुक्र अदा किया कि वह अपने वतन लौट सके।
शनिवार को उनको रिसीव करने बरेली में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी पिता मोहम्मद और मां किशवर जहां व परिवार के अन्य लोग पहुंचे। एयरपोर्ट के बाहर आते ही मां किशवर जहां ने बेटे को गले लगा दिया और भावुक हो उठीं। वहीं पूरनपुर के हैदर भी दोपहर को दिल्ली पहुंचे। उनकी मां आसमां बेगम बेटे को लेने पहुंची थी। बेटे को देखकर वह भी अपने आंसू नहीं रोक सकीं।
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अंशुल गुप्ता अब भी यूक्रेन में फंसा: वसुंधरा कॉलोनी के रहने वाले अंशुल गुप्ता अब भी यूक्रेन के पैसोचिन में फंसे हैं। उनके भाई अर्पित ने बताया कि दोपहर में अंशुल से बात हुई थी। पैसोचिन में फंसे लोगों को ट्रेन के जरिये रोमानिया पहुंचाने का आश्वासन दिया गया है। शाम को ट्रेन मिल गई तो वह सुबह तक रोमानिया पहुंच जाएगा।
बमबारी के बीच रास्ते में दो बार टूटी हैदर की हिम्मत : यूक्रेन के खारकीव से पोगजील रेलवे स्टेशन तक 14 किलोमीटर बमबारी के बीच पैदल चलने पर दो बार हैदर खां की हिम्मत टूट गई थी। रास्ते में भारतीय छात्र की मौत की सूचना और रूसी टैंक खड़ा होने पर साथी छात्र तो रोने लगे थे कि अब शायद घर न पहुंच पाएं। इस दौरान कुछ देर बाद टैक्सी मिलने पर रेलवे स्टेशन पहुंचने की आस बंधी। यूक्रेन-पोलैंड बॉर्डर पर तो 10 घंटे और माइनस 10 डिग्री सेल्सियस तापमान में खड़ा रहना पड़ा। तमाम मुसीबतें झेलता हुआ एमबीबीएस का छात्र शनिवार अपराह्न चार बजे घर आ गया।
हैदर खां ने बताया कि खारकीव में जिस स्थान पर रह रहा था वह रूस बॉर्डर से कुछ ही दूर था। 23 फरवरी की रात तीन बजे धमाके जब शुरू हुए। खिड़की खोलकर देखी तब एअर स्ट्राइक की जानकारी हुई। इसके बाद नींद ही नहीं आई। अगले दिन सुबह होते ही सबको अंदर रहने की चेतावनी दी गई। इससे पहले बाजार एक घंटे के लिए खोला गया। बाजार से खाने का सामान स्टाक किया। युद्ध कब तक चलेगा आदि को लेकर कभी दिन में खा लिया तो कभी भूखे रहे। कई दिन तक बंकर में रहना पड़ा। तीन मार्च को अपने 15 साथियों के साथ खारकीव से पोगजील रेलवे स्टेशन को पैदल रवाना हुए। लगातार बमबारी हो रही थी। रास्ते में सेना का टैंकर खड़ा देख सभी साथी यह सोच कर रोने लगे कि अब रूसी सैनिक जाने नहीं देंगे।
एक-दूसरे का साहस बंधवाकर एक बिल्डिंग के पीछे से स्टेशन की ओर चल दिए। सात किलोमीटर की दूरी तय कर पाए थे। तब बिहार के दोस्त अल्ताफ इमाम ने फोन कर कनार्टक के साथी नवीन की मौत की जानकारी दी। तब रास्ते में मौत का भय सभी को सताने लगा। हिम्मत कर रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर ट्रेन पकड़ी। रास्ते में ट्रेन की लाइन उड़ा दी गई? यह अफवाह सुनने को मिली। मगर जैसे-तैसे यूक्रेन पोलैंड बॉर्डर पहुंचे। तब बॉर्डर पर 10 घंटे तक माइनस 10 डिग्री सेल्सियस तापमान में खड़ा रहना पड़ा। बॉर्डर पर पासपोर्ट जमा कर जांच शुरू की गई। बाद में पासपोर्ट वापस कर पोलैंड में प्रवेश दिया गया। शुक्रवार शाम को पोलैंड से गाजियाबाद की फ्लाइट मिली। सैनिक हवाई अड्डे पर उतारा गया।
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