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सुनाई आपबीतीः जंग का खौफनाक मंजर जेहन से नहीं जाता

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पीलीभीत। रूस-यूक्रेन की जंग के बीच फंसे जिले के छात्र धीरे-धीरे भारत लौट रहे हैं। मंगलवार को चार स्टूडेंट्स अपने घर लौट आए। शहर की वसुंधरा कॉलोनी निवासी अंशुल गुप्ता मंगलवार को शाम सात बजे अपने घर पहुंचे। बच्चे को आंखों के सामने देख परिजन के चेहरे भी खिल गए। वह कहते हैं कि जंग का खौफनाक मंजर बार-बार याद आ जाता है। कोशिश के बाद भी जेहन से नहीं निकल रहा।
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जिले के 23 लोग यूक्रेन में फंसे थे, जिसमें ज्यादातर छात्र थे। मंगलवार को शहर निवासी अंशुल गुप्ता, मोहल्ला सरफराज निवासी मोहम्मद कैफ, भोपतपुर निवासी अरविंद पाल सिंह, पूरनपुर निवासी हर्षित शुक्ला अपने घर लौट आए हैं। यह लोग कई दिनों से यूक्रेन के निकलकर पड़ोस के देशों में थे। अरविंद स्लोवाकिया में थे।
अपने घर पहुंचे अंशुल गुप्ता कहते हैं कि वह खारकीव से बमुश्किल रोमानिया पहुंच सके। एक बस के जरिए सफर तय किया। इस दौरान तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा। यूक्रेन में कत्लेेआम मचा हुआ है। अब रूसी सेना वहां आम नागरिकों को भी निशाना बना रही है। वह मंगलवार को दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे वहां से पीलीभीत अपने घर आए। मोहम्मद कैफ भी शहर पहुंच गए हैं। बेटे को देखकर परिवार वालों की जान में जान लौटी। परिवार के खुशी का माहौल है।
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जिंदगी भर याद रहेंगे दहशत के वो दिन- हजारा थाना के गांव मोरनिया गांधीनगर निवासी एमबीबीएस का छात्र हर्षित शुक्ला मंगलवार दिन में तीन बजे अपनी मां और बहन के पास लखनऊ पहुंच गया। हर्षित ने बताया कि दहशत के वो दिन जिंदगी भर याद रहेंगे। कई दिन भूखे रहकर गुजारने पड़े। पानी को तरसना पड़ता था। पैदल निकले तो बमबारी के बीच कई बार जमीन पर लेट कर जान बचाई।
मंगलवार को लखनऊ अपनी मां के पास पहुंचे हर्षित ने मोबाइल पर बताया कि रूस के हमले के बाद पर उन लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने की चेतावनी दी गई। इससे पहले दो घंटे के लिए बाजार खोला गया। बाजार में सामान खरीददारों की भगदड़ सी मची। जैसे-तैसे पांच दिन के लिए खाने का इंतजाम कर पाया। बाजार बंद होने ही बंकर में पहुंचने की चेतावनी जारी की गई। करीब 10 दिन बंकर में रहने पर खाना, पानी का भी संकट हुआ। कभी भूखे रहे, कभी दो ब्रेड खाने को मिलेे तो कभी चाय पीकर ही गुजारा करना पड़ा।
बिजली सप्लाई बंद कर दी गई। लगातार बम के धमाकों से जान बचनी मुश्किल लग रही थी। हिम्मत कर 10 दिन बाद बंकर से निकलकर साथियों के साथ 35 किलोमीटर की दूरी तक कर पोगजील स्टेशन पहुंचे। रास्ते में लगातार हो रही बमबारी से जमीन पर लेट कर जान बचानी पड़ी। उस दिन ट्रेन से लोगों के निकलने का आखिरी दिन था मगर स्टेशन पहुंचने पर भारतीयों को ट्रेन में चढ़ने ही नहीं दिया गया। मारपीट कर भगा दिया गया। इसके बाद उसे एक आर्मी स्कूल में रखा गया।
दूतावास से मदद मिलने पर बस से उन लोगों को रविवार रात करीब दो बजे रोमानिया बॉर्डर लाया गया। सोमवार शाम को दिल्ली को फ्लाइट मिली। मंगलवार सुबह चार बजे दिल्ली पहुंचा। दिल्ली से 1.40 बजे लखनऊ को फ्लाइट मिली और तीन बजे लखनऊ आ गया। हर्षित के पिता प्रदीप शुक्ला गांव में हैं। उनकी बहन प्रांजलि और भाई अलखनऊ में रहकर बीए कर रही है और भाई अर्पित शुक्ला लखनऊ में रहकर ऑन लाइन पत्रकारिता का कोर्स कर रहा है। अर्पित और प्रांजलि को पढ़ाने को उनकी मां किरन शुक्ला लखनऊ में दोनों बच्चों के साथ एक किराए के घर में रहती है। हर्षित के घर लौटने पर उसके परिजन खासे खुश है।
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