सच्ची लगन और इरादे पक्के हों तो सफलता जरूर मिलती है। न्यूरिया कॉलोनी निवासी मामा भांजे की जोड़ी ने सभी के सामने अच्छा उदाहरण रखा है। दस साल पहले मात्र 30 हजार रुपये से शुरू किया गया मशरूम उत्पादन का काम आज न सिर्फ 15 लाख से ऊपर पहुंच गया है बल्कि गांव के लगभग 15-20 अन्य लोगों को भी इससे जोड़ लिया है। न्यूरिया कॉलोनी की पहचान मशरूम उत्पादक गांव के रूप में होने लगी है। न्यूरिया थाना क्षेत्र में कस्बे निकट स्थित न्यूरिया कॉलोनी बंगाली बाहुल्य गांव हैं। गांव निवासी सुशांत मंडल और उनके मामा देवदास मंडल करीब 10 वर्ष पूर्व मजदूरी करने उत्तराखंड के रुद्रपुर गए थे। यहां किसी कार्यक्रम में उनकी मुलाकात पंतनगर के वैज्ञानिकों से हुई। वैज्ञानिकों की सलाह पर उन्होंने मशरूम उत्पादन शुरू किया। पहली बार मशरूम उत्पादन में लगभग 30 हजार रुपये की लागत आई थी। इसके बाद उनका धंधा चल निकला और जल्द ही उनकी पहचान मामा भांजे मशरूम वाले के रूप में हो गई। आज दोनों बड़े पैमाने पर मशरूम उत्पादन करते हैं। उनका सालाना कारोबार 15 से 18 लाख रुपये तक पहुंच गया है।
कई जिलों में होती है सप्लाई
गांव के कई अन्य लोग भी इससे जुड़े
मामा भांजे की सफलता को देख न्यूरिया कॉलोनी में करीब एक दर्जन से अधिक लोग मशरूम उत्पादन में जुटे हैं जिससे मशरूम उत्पादन गांव का मुख्य व्यवसाय बनता जा रहा है।
ग्रामीणों को मिलता है रोजगार
सुशांत मंडल ने बताया कि नवंबर से शुरू होकर मार्च तक उनके यहां काम चलता है। इससें खुद पूरे परिवार के साथ लगने के अलावा 50-60 मजदूरों की जरूरत पड़ती है। इससे गांव वालों को गांव में ही रोजगार मिल रहा है।
पूरे साल मशरूम उत्पादन की योजना
मशरूम उत्पादक सुशांत की मानें तो सरकार से उन्हें अब तक कोई सहायता नहीं मिली है। यदि सरकार से आर्थिक सहायता मिले तो वह और व्यापक स्तर पर उत्पादन कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि अब पक्का स्ट्रक्चर तैयार कर उसमें एसी लगाकर पूरे वर्ष मशरूम उत्पादन की योजना है।