पीलीभीत। रोजी रोटी कमाने कभी घर से बाहर निकले श्रमिक एक समय तो उसी शहर के होकर रह गए थे, जहां कमाने के साधन थे। मगर, कोरोना में काम धंधा बंद होने के बाद अपने घर पहुंचने के लिए सैकडों किलोमीटर पैदल चलकर आना पड़ा। भूखे पेट और नंगे पैर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर आए श्रमिक बोले- उन्हें न तो अपने खाने की चिंता है, न ही पानी की। कोरोना का डर भी नहीं है। बस एक ही चिंता है कि बच्चों को कुछ खाने केे मिलता रहे। एक बार किसी तरह घर पहुंच जाएं। अपने गांव में रहकर आधी रोटी खा लेंगे। मगर, अब परदेस में नौकरी करने नहीं जाएंगे।
बरसों पहले कमाने की खातिर अपना घर परिवार को छोड़कर दूसरे राज्यों में पैसा कमाने गए श्रमिकों की हालत लॉकडाउन लागू होने के बाद खराब हो गई। एक तो इनके हाथों से काम धंधा छिन गया। आमदनी बंद होने से इनके परिवार के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया। गोद में भूख से बिलखते बच्चे और पैदल थक कर चलने में परिजन असमर्थ हो गए। साइकिल, ट्रक, टैंकर, टेंपो, बस से किसी भी तरह अपने घर पहुंचने को आतुर होकर पीलीभीत पहुंचे। तमाम श्रमिक अपनी मेहनत की पूरी जमा पूंजी खर्च करने के बाद महंगी टैक्सी करके भी घर आए। सरकार ने तमाम अपील की कि कोई भी श्रमिक पैदल न जाए। फिर भी सड़कें श्रमिकों से भरी दिखीं। प्रशासन की सख्ती से कैंपों में लौटने वाले मजदूरों को स्क्रीनिंग के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। स्क्रीनिंग के बाद सवारी नहीं मिली तो तांगा बुग्गी, गन्ने की ट्राली या ट्रक जो भी मिला, उसी से चल देते हैं। जिन्हें सवारी नहीं मिली तो वह पैदल ही आगे चल दिए।
बाहर से आए मजदूरों ने बताया कि सरकारों की मदद देने और खाना पानी देने की बात झूठी है। वे भूख प्यासे ही चलकर आए। अपनी चिंता नहीं, बच्चों का दर्द जरूर है। वे भूख प्यासे चल नहीं पाते। जयपुर, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात समेत तमाम जगहों से श्रमिक पैदल अपने घरों को निकले। इनमें कुछ को ही मदद मिल पाई। अधिकांश को तपती धूप में पैदल ही सफर तय करना पड़ा। ड्रमंड कॉलेज पहुंचने के बाद घंटो लाइन में लगकर स्क्रीनिंग कराई। गर्मी की वजह से कई रास्ते में बेहोश भी हुए। इसके विपरीत अफसरों का कहना है कि आने वाले प्रत्येक श्रमिक की स्क्रीनिंग कराने के बाद घर तक बस से पहुंचाया जा रहा है।
हरियाणा मजदूरी करने गए थे। लॉकडाउन में काम धंधा चला गया। वहां से पैदल ही निकले। कभी ट्रक मिला तो ठीक, वरना पैदल ही आ रहे हैं। अपनी चिंता नहीं, बच्चों के भूखे रहने की चिंता है। किसी तरह घर पहुंच जाएं बस। दोबारा नहीं जाएंगे। -धर्मपाल, बीसलपुर
18 मार्च को बहराइच से मजदूरी करने पिथौरागढ़ गए थे। लॉकडाउन में काम धंधा बंद हो गया। वहां किसी ने घर भिजवाने की व्यवस्था नहीं की। पिथौरागढ़ से 15 दिन पहले चले थे, अब जाकर पीलीभीत पहुंचे। यूपी की सीमा पर पुलिस ने रोक लिया। बहराइच तक पैदल ही सफर करना पड़ेगा। अब बाहर कभी नहीं जाएंगे।- रमेश, बहराइच
जयपुर में पूरे परिवार के साथ ईट भट्टे पर काम करते थे। भट्टा मलिक ने नौकरी से निकाल दिया। जयपुर से पूरे परिवार के साथ पैदल ही घर के लिए निकले थे। भरतपुर पहुंचने के बाद एक रोडवेज बस मिली। उसने पीलीभीत ड्रमंड कॉलेज में पहुंचाया। घंटो से स्क्रीनिंग के लिए लाइन में लगे हैं। बाहर अब कभी नहीं जाएंगे। -मोहित, न्यूरिया
नैनीताल में मजदूरी करते थे। लॉकडाउन के बाद काम नहीं बचा। कई दिन वहां भूखे प्यासे रहे। फिर पैदल ही घर के लिए निकल पड़े। रास्ते में किसी ने कुछ खिला दिया तो खा दिया। वरना पानी पीकर चल रहे हैं। अब तो बस यही है कि एक बार घर पहुंच जाएं। फिर आधी रोटी खा लेंगे, लेकिन परदेस में नौकरी करने नहीं जाएंगे। - धनेश बालिया