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छोटी-बड़ी 1638 औद्योगिक इकाइयों को सरकारी मदद की दरकार

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पीलीभीत। कोरोना संक्रमण से बचाव को लगाए गए लॉकडाउन को दो महीने बीत चुके हैं। इस अवधि में बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट के अलावा छोटी इकाइयों को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि लॉकडाउन के चौथे चरण में नियमों में कुछ ढील मिलने से कुछ औद्योगिक इकाइयां चालू हो गई हैं। मगर, अभी इन्होंने रफ्तार नहीं पकड़ी है। छोटी-बड़ी सभी औद्योगिक इकाइयों के संचालक बूस्टर डोज में सरकार के 20 लाख करोड़ के पैकेज से राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
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जनपद में छोटी-बड़ी 1638 औद्योगिक इकाइयां हैं। कंटेन्मेंट जोन में 60 छोटे और मध्यम उद्योग दो महीने से बंद हैं। लॉकडाउन के चौथे चरण में औद्योगिक इकाइयां खोलने की इजाजत मिलने से कुछ राहत मिली है, मगर इनमें से अभी आधी ही शुरू हो पाई हैं, वो भी महज एक तिहाई श्रमिकों के साथ। नए सिरे से चालू हुई औद्योगिक इकाइयों में से किसी को पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल नहीं मिल रहा तो किसी को श्रमिक उपलब्ध नहीं हैं। बहुत सी औद्योगिक इकाइयां आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं। उत्पादन बंद होने से अब बाजार में उत्पाद की मांग भी घटी है। उद्यमी नया उत्पादन करने से पहले सब कुछ नाप तोल लेना चाहते हैं। तमाम उद्यमियों की हालत यह है कि वह अपने स्टाफ को वेतन नहीं दे पा रहे हैं। अमर उजाला ने औद्योगिक इकाइयों की स्थिति की पड़ताल की। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट-
कोरोना ने बेसुरे कर दिए बांसुरी के सुर
देश- विदेश में विशिष्ट पहचान बनाने वाली बांसुरी को एक बार फिर सुर देने के लिए योगी सरकार ने एक जिला एक उत्पाद योजना में शामिल किया। चंद बांसुरी कारीगरों की मेहनत से यह उद्योग खड़ा होने लगा था, लेकिन लॉकडाउन ने बांसुरी उद्योग की कमर तोड़ कर रखी दी। वर्तमान में बांसुरी कारोबार से 158 लोग जुड़े हैं, लेकिन सिल्चर से बांस की आपूर्ति न होने से तमाम कारीगर इस धंधे को छोड़ने के लिए मजबूर हैं। हालांकि अब केंद्र सरकार इसमें दिलचस्पी ले रही है। स्थानीय प्रशासन और बैंक की मदद मिली तो सांस्कृतिक पहचान वाला यह उद्योग फिर से खड़ा होकर तराई के जनपद को एक नई पहचान दिला सकता है।
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दो महीने से बंद पड़ी हैं 112 राइस मिलें
औद्योगिक इकाइयों में राइस मिलें यहां पहले पायदान पर हैं। तराई का इलाका चावल उत्पादन के लिए जाना जाता है। इसलिए जनपद में सर्वाधिक 112 राइस मिले हैं। मगर इन राइस मिलों को लॉकडाउन से ऐसा झटका लगा कि यह जनता कर्फ्यू के दिन से ठप पड़ी हैं। राइस मिलर्स के मुताबिक इंडस्ट्रीयल सेक्टर को मजबूती देने की जितनी भी बातें की जा रही हैं, उनमें एक भी धरातल नहीं उतरी है। बैंकों को आज तक गाइडलाइन नहीं आई। सरकार कहती है कि कामगारों को काम दो। मगर, उन्हें काम तब मिलेगा जब इंडस्ट्री का पहिया घूमेगा।
रफ्तार नहीं पकड़ सकी कुम्हारों की चाक
छोटे कुटीर उद्योगों की बात करें तो जनपद में 1034 शिल्पकारों के परिवार है। इसमें 626 मिट्टी से बर्तन, सुराही, गमले बनाते हैं। 124 लोगों को पट्टे पर जमीन दी गई है। 67 कामगारों को इलेक्ट्रॉनिक चाक भी मिली। मगर कोरोना के लॉकडाउन ने कुम्हारों की कमर तोड़ दी। माल तैयार था, लेकिन खरीदार नहीं थे। दो-तीन दिनों से ग्राहकों ने चीनी मिट्टी से बने बर्तनों की खरीदारी शुरू की तो कुछ राहत मिली। विभागीय अफसरों के मुताबिक इनको 10 लाख रुपये तक का ऋण देने की व्यवस्था है। मगर, यह सब कुछ अभी कागजों में ही है।
बीड़ी कारोबार से प्रवासियों को जोड़ने की उठाई मांग
बंगाली समुदाय समेत कुछ अन्य लोग भी बीड़ी का कारोबार करते हैं। न्यूरिया स्थित गुरुपद बीड़ी कंपनी की दो फर्मों द्वारा प्रति वर्ष ढाई से तीन करोड़ का जीएसटी चुकाया जाता है। इस कारोबार से 3000 महिलाएं और युवतियां जुड़ी हुई हैं। इसके अलावा जनपद में 15 से 20 जिलों में बीड़ी के अन्य कारखाने हैं, हालांकि ये इकाइयां सरकार की बिना अनुमति चल रही हैं। लॉकडाउन में इन सबका माल बिकना बंद हो गया। इनकी मांग है कि बाहर से आने वाले प्रवासियों को भी बीड़ी बनाने का प्रशिक्षण मिले तो वह भी आत्मनिर्भर होंगे। उद्योग भी आगे बढ़ेगा। अभी इस उद्योग को भी सरकारी मदद की दरकरार है।
उद्यमी बोले- धरातल पर आए सरकार की सहायता
राइस मिलें मार्च से बंद पड़ी हैं। बूस्टर डोज देने की बात सरकार की ओर से कही गई है, लेकिन बैंकों के पास अभी तक इस बारे में गाइडलाइन ही नहीं आई। सब कुछ हवा हवाई चल रहा है। -अश्वनी अग्रवाल, अध्यक्ष, राइस मिल एसोसिएशन
एक जिला एक उत्पाद योजना में बांसुरी को शामिल तो कर लिया गया, लेकिन सरकार की ओर से मदद नहीं दी गई। इनका सर्वे कराया जाए तो मदद पाने वाले इक्का दुक्का ही मिलेंगे। कच्चा माल ही नहीं है तो बांसुरी कहां से बनेगी। - इकरार मियां, बांसुरी कारीगर
आरबीआई के नियमानुसार पात्रों को ऋण देने की प्रक्रिया चल रही है। कोविड-19 के दौरान उद्योग, हाउसिंग लोन, कोविड लोन, एमएसएमई के पात्रों को ऋण दिया जा रहा है। प्रत्येक बैंक की अपनी गाइडलाइन है। डिफाल्टरों को छोड़कर सभी पात्रों को ऋण देने की व्यवस्था है। - एमएम प्रसाद, लीड बैंक प्रबंधक
कोविड-19 आने के बाद कई उद्योग बंद पड़े हैं। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद इन उद्योगों को फिर से शुरू करवाने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। प्रवासी मजदूर और कामगारों को भी इनमें काम मिलेगा। जिला उद्योग केंद्र और खादी ग्रामोद्योग से ऋण देने की प्रक्रिया जारी है। - एके गंगवार, जिला एवं खादी ग्रामोद्योग अधिकारी
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