एचआईवी पीड़ितों के इलाज की राह लिंक एआरटी बनने के बाद भी आसान नहीं हो सकी। एआरटी के सभी छह पद खाली पड़े हैं। जिला अस्पताल में स्टाफ की खासी कमी है। ऐसे में एआईवी संक्रमितों को दवा लेने बरेली जाना पड़ रहा है। काफी प्रयासों के बाद भी जिले में एचआईवी संक्रमितों की तादाद साल दर साल बढ़ती जा रही है। पिछले साल जिले में करीब 21 एचआईवी पीड़ित पाए गए थे। इस साल दस माह के भीतर एचआईवी पीड़ितों की संख्या बढ़कर 39 हो गई। इन एचआईवी संक्रमितों की पहचान को जिला अस्पताल में दो आईसीटीसी सेंटर हैं। इनमें जांच के बाद एचआईवी पीड़ितों को बरेली स्थित एआरटी सेंटर भेजा जाता था। जिले में एचआईवी पीड़ितों की बढ़ती तादाद को देखते हुए साल के शुरूआत मेें जिला अस्पताल में लिंक एआरटी (एंटी रिट्रोवायरल थेरेपी) स्थापित की गई थी। राजकीय रक्तकोष के प्रभारी डॉ. महावीर सिंह को इसके नोडल अधिकारी हैं।
महज नाम की लिंक एआरटी
माना जा रहा था कि लिंक एआरटी के शुरू होने के बाद एचआईवी संक्रमितों को यहीं से दवा मिल सकेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एआरटी होने के बाद भी मरीजों को दवा लेने बरेली जाना पड़ रहा है। इसकी वजह स्टाफ की तैनाती न होना बताया जाता है। मानक के अनुसार दो डॉक्टर, एक फार्मासिस्ट, एक काउंसलर व दो स्टाफ नर्स होने चाहिए। ये सारे पद अभी खाली पड़े हैं। नोडल अधिकारी की देखरेख मेें आईसीटीसी की काउंसलर, एलटी के सहारे काम चलाया जा रहा है।
जिला अस्पताल में लिंक एआरटी स्थापित की जा चुकी है, लेकिन स्टाफ उपलब्ध नहीं कराया गया है। एचआईवी पाजेटिव को शुरूआत में छह माह तक एआरटी बरेली से दवा दी जा रही है। इसके बाद स्थानीय एआरटी से ही दवा दी जा रही है
डा. महावीर सिंह, नोडल अधिकारी, लिंक एआरटी